वि दे ह विदेह Videha बिदेह http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका B R E A K the Language Barrier - Read in your own script
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बालानां कृते
१.
कणकमणि
दीक्षित-
भगता बेङक कथा-
नेपालीसँ मैथिली अनुवाद:
श्रीमती रूपा
धीरू आ
श्री
धीरेन्द्र प्रेमर्षि द्वारा
२.
डॉ॰
शशिधर कुमर “विदेह”-अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस(21
फरबरीक अवसरि पर विशेष)
१
कणकमणि
दीक्षित, ५५ बर्ख, हिमाल खबरपत्रिकाक प्रकाशक आ हिमाल साउथ एशियनक
सम्पादक छथि। ओ कॉलेजक पढ़ाइ काठमाण्डूसँ, लॉ क पढ़ाइ दिल्लीसँ आ परास्नातकक
पढ़ाइ न्यूयॉर्कसँ केने छथि।
नेपालीसँ मैथिली अनुवाद:
श्रीमती रूपा
धीरू आ
श्री
धीरेन्द्र प्रेमर्षि द्वारा
रूपा धीरू: रूपा धीरू- जन्मस्थान-मयनाकडेरी, सप्तरी, श्रीमती पूनम झा आ श्री अरूणकुमार झाक पुत्री।स्थायी पता- अञ्चल- सगरमाथा, जिल्ला- सिरहा। प्रथम प्रकाशित रचना-कोइली कानए, माटिसँ सिनेह (कविता),भगता बेङक देश-भ्रमण (कनक दीक्षितक पुस्तकक धीरेन्द्र प्रेमर्षिसँग मैथिलीमे सहअनुवाद,सङ्गीतसम्बन्धी कृति- राष्ट्रियगान, भोर, नेहक वएन, चेतना, प्रियतम हमर कमौआ (पहिल मैथिली सीडी), प्रेम भेल तरघुस्कीमे, सुरक्षित मातृत्व गीतमाला, सुखक सनेस। सम्पादन-पल्लव, मैथिली साहित्यिक मासिक पत्रिका, सम्पादन-सहयोग,हमर मैथिली पोथी (कक्षा १, २, ३, ४ आ ५ आ कक्षा 9-10 क ऐच्छिक मैथिली विषय पाठ्यपुस्तकक भाषा सम्पादन)।
धीरेन्द्र प्रेमर्षि, सिरहा,
नेपाल 1967-
वि.सं.२०२४ साल भादब १८ गते सिरहा जिलाक गोविन्दपुर-१, बस्तीपुर गाममे जन्म
लेनिहार प्रेमर्षिक पूर्ण नाम धीरेन्द्र झा छियनि।कान्तिपुरसँ हेल्लो मिथिला
कार्यक्रम प्रस्तुत कर्ता जोड़ी रूपा-धीरेन्द्रक धीरेन्द्रक अबाज गामक
बच्चा-बच्चा चिन्हैत अछि। “पल्लव” मैथिली साहित्यिक पत्रिका आ “समाज” मैथिली
सामाजिक पत्रिकाक सम्पादन।
भगता बेङक कथा
काठमाण्डूक आकर्षण
भक्तप्रसाद एखन बेङचीसँ बेङ बनबाक उपक्रममे छल । अर्थात बाल्यावस्था पार कऽ जुआन होइत रहए । ओ काठमाण्डूक इचङ्गू नामक स्थानपर धानक खेतमे अपन बाबा बुद्धिप्रसाद, माए सानुमैयाँ आ भाए–बहिनक सङ्ग रहैत छल । इचङ्गू स्वयम्भूक पच्छिमभर अछि । ओकरा अपन उमेरक बेङसँ किछु बेसीए बुझबाक जिज्ञासा रहैत छलैक । ओकरा परिवारमे सभसँ पहिने कूदफान करऽवला सेहो उएह छल । भक्तप्रसादक घरे लग एकटा एकपेड़िया रहैक । ओहिबाटे मौगी– मेहरि, पुरुष–पात आ धीयापुता सभ अवर्जात करैत रहए । भक्तप्रसादक मोनमे जिज्ञासा होइत छलैक जे ई सभ कतऽ सँ अबैत अछि आ कतऽ जाइत अछि ? बेङ सभकेँ मनुक्ख जकाँ एमहर–ओम्हर करैत रहबाक आवश्यकता नहि रहैत छैक । ओ सभ एक्कहि ठाम कहुना कऽ एहि प्रतीक्षामे बैसल रहैत अछि जे कखन कोन कीड़ा–मकोड़ा भेटए आ
ओकरा गटकि जाइ । ओकरा सभकेँ मात्र साँप सँ बचिकऽ रहऽ पड़ैत छैक । एकरा अतिरिक्त ओ सभ चिक्का–दरबर खेलाइत कण्ठ फाड़ि–फाड़ि कऽ टर्र–टर्र टरटराइत रहैत अछि । ओकरा सभक जिनगी बस्स
एतबए अछि ।
मुदा लोकसभ ओहिठामक एकपेड़ियाबाटे एमहर–ओमहर करिते रहैत अछि । एना बुझइत छैक जेना ओ सभ कतहु जा–रहल होअए ।
एक दिन भक्तप्रसादकेँ बुझेलै जे एहि तरहेँ चलऽवला के जरूर कोनो ‘उद्देश्य’ रहल करैत होएतैक । गर्मीक समयमे एक दिन किशोर वयक भक्तप्रसाद सोचलक— “हमरो कोनो उद्देश्य होएब आवश्यक अछि । हमरो तँ किछु करबाक चाही ।”
मुदा तहिया धरि तँ भक्तप्रसादक नाङरि सेहो नीक जकाँ नहि झड़ल छलैक । ओ बेसी दूर नहि जा सकैत रहए । तेँ ओ कहुना घरे लग रहल चबुतरा धरि मात्र घूम फिर करबाक हिम्मति करए ।
चबुतरापर आबऽ–जाएवला बटोही सभ सुस्ताइत रहए । ओहि बटोही सभक गप्प–सप्प सूनि कऽ ओकरा ई बुझ्बामे अएलैक जे धानक खेतसँ हटियोकऽ दोसर कोनो संसार छैक ।
ओहि दोसर संसारकेँ देखबाक उत्सकुतासँ भक्तप्रसाद काठमाण्डू उपत्यका दिस नजरि फिरौलक । ओहि समय सूर्यास्त होबऽ लागल छलैक । साँझ्क ललौन सूर्यक किरिनसँ धानक हरियर–हरियर खेत सभ
पिराउँछाउन चमकि रहल छल । ओहि सँ किछु दूर ओ घनगर खपड़ैल घर सभ, मन्दिरक गुम्बज सभ आ विशाल–विशाल दरबारक बुर्ज सभ देखलक। ओकरा विश्वास भेलैक जे इचङ्गूक बेङ सभ जाहि ‘शहर’क बात करतै छल से निश्चित रूपेँ इएह थिक । भक्तप्रसाद सुनने छल जे शहरमे मोटर–गाड़ी, बिजली–पङ्खा आ सैकड़ो कोठलीवला बड़का–बड़का बङ्गला सभ होइत छैक ।
एक दिन भक्तप्रसादक कनेक लटकलहा नाङरि सेहो टूटि गेलैक । ताही दिन ओ सभसँ कहलकैक जे आइ साँझ्मे ओ घर छोड़ि देबाक निश्चय कएलक अछि ।
“किएक छोड़बह ?”— सभगोटे एक्कहि स्वरमे पुछलकैक । घर छोड़ि ओ दूर जा सकैत अछि ताहि बात पर ओकरा घरक ककरो विश्वासे नहि छलैक ।
भक्तप्रसाद जवाब देलक— “हम एहि दुनियासँ बाहरी दुनियाक अनुभव करऽ चाहैत छी । हम देखऽ
चाहैत छी जे शहरमे लोकसभ कोना रहैत अछि । हम तराइमे जाए चाहैत छी । हमरा बड़का नदी, आश्चर्यजनक प्राणी सभ, समतल काठमाण्डूक आकर्षण चौरी–चाँचर आ बड़का–बड़का पहाड़ सभ देखबाक मोन होइत अछि ।”
घरक अभिभावक बुद्धिए प्रसादटा भक्तप्रसादक मोनक बात बुझ्लकैक । बहुतो साल पहिने ओकरो मोनमे एहने विचार आएल रहैक । मुदा, ओ अपन सोचलहा नहि कऽ पओने रहए । ओकरा अपन सोचलाहा पूरा नहि होएबाक बडड् पछताबा छलैक । तेँ ओ प्रसन्न भऽ अपन हिम्मतगर पोताकेँ देखि मोनहि मोन विचार कएलक— “ई छौड़ा हमरोसँ बेसी हिम्मतगर बहराएल । अपना विचारमे ई अड़ल रहऽवला अछि । एकरा केओ नहि रोकि सकैत अछि ।”
भक्तप्रसादक घर छोड़िकऽ जएबाक निर्णयसँ दुःखित भऽ सभटा बेङ एकठाम जमा भेल । ओकरा सभकेँ बद्धि प्रसाद कहलककै — “एकरा जाए दहक । जखन ई बाहरी दुनिया देखि लेत तँ हमरा सभकेँ कतेको नव–नव बात सभ बताओत ।” तैयो भक्तप्रसादक माए सानुमैयाँ किछु कहऽ चाहतै छलि कि भकप्रसाद चटपट सभकेँ प्रणाम-पाती कऽ विदाह भऽ गेल ।
“बाबा ! हम जाइ छिअह ।” भक्तप्रसाद जाइत–जाइत जोरसँ चिकरैत बाजल । तकरा बाद ओ लोकक चलऽवला रस्तासँ चलनाइ शुरू कएलक आ जा अपन खेतसँ अऽढ़ नहि भऽ गेल ता ओ उनटिकऽ नहि
तकलक । किछु दूर चललाक बाद ओ मोटर–गाड़ी दौड़ऽवला पक्की सड़कपरसँ चलनाइ शुरु कएलक ।
........
(जारी...)
२.
डॉ॰
शशिधर कुमर “विदेह”
अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस
(21 फरबरीक अवसरि पर विशेष)
एक – आध महिना पहिनुक गप्प थिक । शीतलहरीक समय छल । साँझ खन दलान पर, लालटेमक ईजोत मे धिया – पुता सभ पढ़ि रहल छल । सोझाँ मे घूर पजड़ल रहै आ सभ बूढ़ – पुरान लोकनि घूर लग बैसल छलाह ।
रेडियो बाजि रहल छल, गप्प – सड़क्का चलि रहल छल । धिया – पुताक मोन सेहो पढ़बा पर कम्मे आ घूर लग बाजि रहल रेडियो आ चलि रहल गप – शप दिशि बेशी छल । एक तऽ शीतलहरी, दोसर रतुका भोजनक समय लगिचाएल आ तेसर सामने बजैत रेडियो आ गप्प सड़क्का – तखन तऽ स्वभाविकहि जे पढ़बा मे मोन कोना लगओ ? मोन मसोसि कऽ बैसल किताब दिशि ताकि रहल छल आ प्रतिक्षा मे छल जे कोनहुना समय बीतय आ खएबाक लेल जएबाक अनुमति भेटओ ।
एतबहि मे हम आङ्गन सँ दलान पर अयलहुँ । हमरा देखितहि धिया – पुता सभ केर मोन खुश । खुश होयबाक कारण ई जे आब ओकरो सभ केँ गप्प मारबाक संवैधानिक अधिकार भेटैत बुझि पड़लै । जे लोकनि घूर लऽग बैसल रहथि से बहुत पैघ, बहुत बुजुर्ग – तेँ पढ़ब छाड़ि हुनिका सभ सँ बतिअएबाक मतलब छल डाँट सुनब । हुनिका सभक आशय जे जा धरि अङ्गना जयबाक बिझो नञि भऽ जाय ता धरि किताब लऽ कऽ बैसल रहह ।
हमरा अबैत देखि कऽ सोनी हमरा कुर्सी दैत बाजलि – यौ बैसू ।
– की पढ़ैत छी अहाँ सभ ? वस्तुस्थिति तऽ हमरा बुझाइए गेल छल तथापि हम पूछल ।
- यौ की पढ़ब ? रेडियो सुनि रहल छी – से तऽ अहूँ केँ बुझाइए गेल होयत । प्रिया धीरे सँ बाजलि ।
पढ़बा छाड़ि कऽ बतिआएब हमरो पसिन्न नञि पर बेमोन सँ किताब लऽ कऽ बैसबा सँ की लाभ ? इएह सोचैत हम पूछल – ई बात तऽ नीक नञि ?
केओ किछु नञि बाजल आ
चुपचाप हमरा दिशि ताकए लागल । हमरो बुझाएल जे एहि मे धिया – पुताक कोन दोष
। नेनपन तऽ निर्दोष होइत अछि, ओकर अप्पन कोनो दिशा नञि होइत छैक, जे दिशा
देखाओल जाइछ तकर अनुसरण करैछ । दोष ओहि वातावरणक थिक जाहि मे किछु लोकनि
पढ़बाकेँ मात्र नित्य कर्म जेकाँ बुझैत छथि आ धिया – पुताक अध्ययन –
अध्यापन केर प्रति एखनहु लापरवाह छथि । ई स्थिति कोनो एक ठामक नञि अपितु
मिथिला मे एखनहु एखनहु स्थिति एहि दिशा मे बहुत असन्तोषप्रद अछि । अनायस
मोन मे श्री अरविन्द कुमार “अक्कू”जीक गीतक दू पाँती याद आबि गेल
सखी पिया केँ पत्र आइ हम, कोना कऽ लिखबै हे ?
ककरा सँ अ – आ – क – ख – ग – ङ सिखबै हे ?
...............................................................
पाँचे बरष सँ फुलडाली
लए, तोड़ब सिखलहुँ फूल अरहूल ।
जानी ने हम चिट्ठी - पत्री, छी बेटी मिथिला केर मूल ।
हलाकि आजुक स्थिति उपरोक्त गीतक पाँती सन नञि अछि, पर बेशी किछु एखनहु नञि बदलल अछि । आन ठामक धिया – पुता केर पढ़बाक व पढ़एबाक तरीका परिस्कृत भेल अछि, ओ सभ एहि क्षेत्र मे सजग भेल अछि, ओहि ठाम धिया – पुता नेनपनक आनन्द सेहो उठबैछ आ अपेक्षाकृत कम मेहनति कऽ कऽ नीक शैक्षणिक स्तर केँ सेहो प्राप्त करैछ । अपना सन्दर्भ मे बात एकदम उनटा । मैथिल धिया – पुता केर जे किछु उपलब्धि देखैत छी से अपेक्षाकृत बेशी मेहनति कऽ कऽ आ नेनपनक बलिदान कएलाक उपरान्त भेटैछ । विशिष्ट उपलब्धि – जेना कि आइ॰ ए॰ एस॰, आइ॰ पी॰ एस॰ आदि - केर सुची भलहि नम्हर हो पर मैथिल धिया – पुताक औसत उपलब्धि बहुत असन्तोषजनक अछि । या तऽ नेनपनक पाछाँ शिक्षा हेराए जाइत अछि या फेर शिक्षाक पाछाँ नेनपन, जखन कि आन ठामक धिया – पुता केँ दुहुक लाभ ओ सुख भेटैछ । आ गामक सन्दर्भ मे “धिया – पुता” कहाँ - एखनहु मात्र “पुता” । “धिया” केर पढ़ाई तऽ बहुशः एखनहु ओहिना अछि – हाँ चिट्ठी पढ़ि - जरूर लीखि आ पढ़ि सकैत छथि, पर ताहि सँ की ? एखनहु बहुधा स्थिति ओएह अछि, ओएह मानसिकता कि धिया – पुता किताब लऽ कऽ बैसल अछि, सामने फलतूक गप्प चलि रहल अछि, रेडियो बाजि रहल अछि ..........................। बियाह काल वर पक्ष पुछैत अछि कि कनिञा कते पढ़ल छथिन्ह तेँ नाँव लिखा देने छियै, पास तऽ भइए जेतै ......................... । एखनहु कते घण्टा किताब लऽ कऽ बैसल से देखल जाइत अछि, की पढ़लक से नञि ।
- यौ एकटा चीज पुछबाक अछि । सोनीक शब्द हमर मोनक विचार - प्रवाह केँ तोड़लक ।
- की ? पूछू । हम बजलहुँ ।
- ई “मातृभाषा दिवस” की होइत छै ?
- अहाँ केँ के कहलक ?
- नञि, रेडियो पर किछु बजैत छलै ।
- 21 फरवरी कऽ हर साल “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस” (International Mother Language Day) केर रूप मे मनाओल जाइत अछि ।
- से किएक ? पवन बाजल ।
- अहाँ सभ केँ तऽ बुझलहि होयत कि जखन 15 अगस्त 1947 ई॰ कऽ जखन भारत स्वतन्त्र भेल तऽ भारत केर विभाजन भेल आ पाकिस्तान नामक देश बनल ।
- हाँ । से तऽ सभ केँ बुझल छै - सोनी बाजलि ।
- ओहि समयक पाकिस्तानक दू टा भाग छल पच्छिमी पाकिस्तान यानि कि आजुक “पाकिस्तान” आ “पुरबी पाकिस्तान” अर्थात् आजुक “बाङ्गला देश” ।
- 21 मार्च 1948 ई॰ कऽ पाकिस्तानक तत्कालीन गवर्नर जनरल स्व॰ मोहम्मद अली जिन्ना जी आदेश देलन्हि कि सम्पुर्ण पाकिस्तान केर राजकाजक एकमात्र भाषा होयत “उर्दू” ।
- जेना कि अपना देश मे “हिन्दी” - पवन बाजल ।
- नञि पवन बाबू, अहाँक ई जानकारी गलत अछि । भारत एहि परिप्रेक्ष्य मे थोड़ेक उदार नीति अपनओलक । भारत केर आठम अनुसुची मे मान्यता प्राप्त हरेक भाषा राष्ट्रभाषा थिक आ नैतिक व संवैधानिक रूपेण समान अधिकार रखैछ । जा धरि “हिन्दी” केर लेल सम्पुर्ण भारतवर्ष मे समान रूप सँ सहमति नञि होइछ ता धरि पूरा भारत मे “हिन्दी” आ “अंग्रेजी” राजकाजक भाषा रहत । संगहि - संग आठम अनुसुची मे शामिल आन भाषा सभ सेहो अपन – अपन क्षेत्र वा राज्यविशेष मे राजकाजक भाषा रहत । जेना कि बंगाल मे बंगाली, महाराष्ट्र मे मराठी आ .............
- ............... आ मिथिला मे मैथिली । पवन बिच्चहि मे लोकैत बाजल ।
- हाँ । तऽ स्व॰ जिन्ना जी केर आदेश सँ तत्कालीन पच्छिमी पाकिस्तानक लोक सभ केँ खुशी भेलन्हि किएक तऽ हुनिका लोकनि केँ उर्दू नीक जेकाँ अबैत छल । पर तत्कालीन पुरबी पाकिस्तानक लोक क्षुब्ध भऽ उठलाह कारण हुनिका लोकनि केँ “बाङ्गला” केर अतिरिक्त आन भाषा वा उर्दू नञि अबैत छलन्हि ।
- तऽ फेर की भेलै ? उत्सुकता भरल स्वरेँ प्रिया पुछलक ।
- फेर पुरबी पाकिस्तान मे एहि प्रस्तावक भयंकर विरोध भेल । पुरबी पाकिस्तानक राजधानी ढाका मे छात्र लोकनि शान्तिपुर्ण प्रदर्शन कएलन्हि आ बन्न आयोजित कयलन्हि । पर तत्कालीन पाकिस्तान सरकार एहि विरोधक यथासम्भव दमण कएलक । 21 फरबरी 1952 ई॰ केर दिन शान्तिपुर्ण प्रदर्शन कए रहल छात्र लोकनि पर गोली चलाओल गेल । बहुत लोकनि घायल भेलाह आ बहुतहु प्राण गमओलाह । प्राण गमओनिहार आन्दोलनकारी छात्र लोकनि मे प्रमुख छलाह स्व॰ अब्दुर्सलीम, स्व॰ रफ़ीक़ उद्दीन अहमद, स्व॰ अब्दुल बर्कत आ स्व॰ अब्दुल ज़ब्बार ।
- ई तऽ जलियाँबाला बाग जेकाँ काज भेल । पवन बाजल ।
- हाँ । बाङ्गला देशक स्वतन्त्तताक बाद 21 फरबरी 1952 ई॰ केर दिन दिवंगत भेल सभ गोटेक स्मरण चिन्हक रूप मे “ढाका विश्वविद्यालय” केर प्राङ्गन मे एक गोट स्मारकक निर्माण कराओल गेल, जकर नाँव थिक “शहीद मिनार” ।

चित्र १ – ढाका विश्वविद्यालय परिसर स्थित “शहीद मिनार”
(साभार सौजन्य – विकिपीडिया, पब्लिक डोमेन)
- तऽ तहिये सँ “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस” मनाओल जाय लागल । प्रिया बाजलि ।
- नञि । एतेक आसान नञि छल । बहुतहि संघर्ष चलल । 26 मार्च 1971 ई॰ कऽ पुरबी पाकिस्तान अपना आप केँ स्वतन्त्र घोषित कएलक पर पाकिस्तान सरकार केँ से मान्य नहि । अन्ततः 16 दिसम्बर 1971 ई॰ केर दिन युद्ध मे पुरबी पाकिस्तान द्वारा पच्छिमी पाकिस्तान पराभूत भेल । पुरबी पाकिस्तान स्वतन्त्र देश बनल जकर नाँव राखल गेल “बाङ्गला देश” । यद्यपि फरबरी 1974 ई॰ मे पकिस्तान बाङ्गला देश केँ स्वतन्त्र देश मानलक तथापि 26 मार्च 1971 ई॰ केर दिन केँ “बाङ्गला देश” मे स्वाधीनता दिवस केर रूप मे मनाओल जाइत अछि ।
- हाँ 1971 ई॰ केर युद्धक चर्च हमर इतिहासक किताब मे अछि । विकास बाजल ।
- बहुत बाद मे 17 नवम्बर 1999 ई॰ कऽ यूनेस्को (UNESCO; United Nations Educational, Scientific and Cultural Organization) द्वारा 21 फरबरी केँ औपचारिक रूपेँ “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस” केर रूप मे घोषित कएल गेल । आ ताहि दिन सँ हरेक वर्ष 21 फरबरी केर दिन “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस” दिवस केर रूप मे मनाओल जाइत अछि । एहि दिवस केँ मनएबाक मुख्य उद्देश्य भाषायी आ सांस्कृतिक वैविध्य केँ संरक्षण करब आ बहुभाषिता (
multilingualism) केँ बढ़ायब थिक ।

चित्र २ – ऑस्फील्ड पार्क, सिडनी, ऑस्ट्रेलिया स्थित “अन्तर्राष्ट्रिय मातृभाषा दिवस स्मारक”
(साभार सौजन्य – विकिपीडिया, पब्लिक डोमेन)
- चलू, आइ बहुत नीक चीज बताओल अहाँ । प्रिया बाजलि ।
- हाँ, ओना तऽ हम सभ खाली किताब खोलि बैसल रही आ घूर तऽरऽक गप्प पिबैत रही । अहाँ केँ अयला सँ किछु नऽव सीखल । सोनी बाजलि ।
- तऽ आब रतुका भोजन केर लेल चली ? हम पूछल ।
- हँ ........ हँ .......... सभ धिया – पुता बाजल । आ हम सभ रतुका भोजनक लेल आङ्गन दिशि विदा भेलहुँ ।
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
