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१.
जगदीश
चन्द्र ठाकुर ’अनिल’ २.वनीता कुमारी ३.
अमित
मिश्र-
गजल -कविता
४.
आनन्द झा
-गीत- गै
माए ५.
जगदानंद झा
'मनु'
कविता –सभसँ
आगु आगु छी
१
जगदीश
चन्द्र ठाकुर ’अनिल’
गजल १
पढबाक मोन होइए, लिखबाक मोन होइए
किछु ने किछु सदिखन सिखबाक मोन होइए ।
अन्हड जे रातिखन एलै, सब गाछ डोलि गेलै
टिकुला कतेक खसलै, बिछबाक मोन होइए ।
सासुर इनार होइए आ डोल थिकहुं हमहूं
किछु ने किछु एखनहुं झिकबाक मोन होइए ।
अहां आबि जे रहल छी, सुनिक’ बताह भेलहुं
गोबरसं आइ आंगन निपबाक मोन होइए ।
दुइ ठोर थीक अथवा तिलकोर केर तडुआ
होइत अछि लाज लेकिन चिखबाक मोन होइए ।
कोनो ऑफिसक चक्कर लगब’ ने पडै ककरो
ई बीया विचार-क्रान्तिक छिटबाक मोन होइए ।
आजादीक लेल एखनहुं संघर्ष अछि जरूरी
व्यर्थ गेल सब मांगब, छिनबाक मोन होइए ।
गजल २
जै खातिर मारा-मारी अछि
भात-दालि-तरकारी अछि ।
छात्र गरीबक धीया-पूता
विद्यालय सरकारी अछि ।
ई जे उल्लू देखि रहल छी
लक्ष्मी मैयाक सबारी अछि ।
सदाचारके शिक्षा सबठां
सबठां चोरबजारी अछि ।
भोज करत रसगुल्लाके
बडका ई भ्रष्टाचारी अछि ।
घूस, दहेजक चस्का बूझू
छूआछूतक बीमारी अछि ।
देश द्रौपदी, हम भीष्म छी
हमरहुँ ई लाचारी अछि ।
२
वनीता कुमारी
प्रजातंत्रक पुनर्निमाण
प्रजातंत्र पर विचारविमर्श
के भष्ट आ के आदर्श
राजनीति मे आनी सदाचार
मिटाबी सबतरहक भष्टाचार
जागरूक रहय सब जनता
व्यर्थ नहिं होय ककरो नागरिकता
होय परीक्षा राजनेता के योग्यताक
तखने भेटय आज्ञा चुनाव लड़बाक
वैह नागरिक क सकय मतदान
जकरा होय अधिकारक पूर्ण ज्ञान
साक्षरताक प्रसार जहिना आवश्यक
अनिवार्य जानकारी तहिना लोकतंत्रक
किछु आधारभूत पाठ्यक्रम के ईच्छा
ताहिमे होय बढ़िया परीक्षा
बिना उत्तीर्ण भेने नहिं सम्भव
चुनावक उम्मीदवार आ मतदाताक पद
३
अमित
मिश्र
गजल -कविता
१
गजल
जीवन मे जौँ नै रहबै कने सामने रहू
,
जा धरि चलै छै साँस हम्मर सामने रहू
,
केहनो हो मौसम फुल गमक नै छोड़ै छै
,
प्रेमक गाछ कए फुल छी गमकौने रहू
,
लोग कतबो दुषित करै छै पर्यावरण
,
सुर्य-चान उगबे करतै समझने रहू
,
जौँ हटि जायब प्रियतम अहाँ सामने सँ
,
हमरा संग सिनेह हारत
,
जीतौने रहू
,
ऐ वालेंटाइन देखा दियौ प्रेमक तागत
,
नभ सँ भू धरि प्रेम जाम छलकौने रहू
काँट इ जमाना छै सिनेह गुलाबक फुल
,
"अमित
" नदी कए दुनू कात सम्हारने रहू . . . । ।
२
होली क एक
गजल
चढ़लै फगुआ
सुनि लिअ
,
मस्ती चढ़ल छै जानि लिअ
,
जोगीरा संग झुमै जाउ यौ
,
मौसम सँ खुशी छानि लिअ
,
रोक-टोक नै सब पिने छै
,
झुमु-नाचु छाती तानि लिअ
,
लाल पियर गुलाबी कारी
,
सब रंगक गड्ढा खुनि लिअ
,
अबिरक खुशबू गमकै
,
रंगक चादर तानि लिअ
,
रामा छै सासुर मे बैसल
,
सारि कने रंग मानि लिअ
,
अबिर द'
क'
गोर लागै छी
,
माथ हम्मर
,हाथ
आनि लिअ . .
३
***
गजल ***
चाँन देखलौ त'
सितारा की देखब
,
अन्हारक रूप दोबारा की देखब
,
प्रेमक सागर मे बड़ मोन लागै
,
डुब'
चाहै छी त'
किनारा की देखब
,
एहि ठामक मिठाई सँ बेसी मिठ
,
रूपक छाली सिंगहारा की देखब
,
अपने आप राति रंगीन भ'
जाए
,
फेर बोतलक ईशारा की देखब
,
मेघक डरे चान नै बहरायल
,
ओ नै औता त'
नजारा की देखब
,
जखन यादिक सहारे जी सकै छी
,
तखन चानक सहारा की देखब . . . । ।
४
कविता
मखानक पात
जहिना मखानक पात नया मे काँट सँ भरल होइ छै
,
आ पुरान भेला पर कोमल भ'
जाइ छै
,
एकटा छोट बच्चा एक्के हाथे मसैल सकै छै .
ओहिना मनुष्यक जीवन होइ छै
,
जखन धरि जुआनी तखन धरि बड़ बलगर
,
जखने देह खसल आँखि धसल दाँत बाहर
,
बस लाति-मुक्का सँ स्वागत शुरू भ'
जाइ छै
,
जुआनी मे जे पाँच-पाँच सेर दुध पिबै छल
,
आब आधा कप चाह गारिक बिस्कुट संग भेटै छै
,
जीवन भरि जे अपन कपड़ा नै खिचलक
,
पुतहु कए साड़ी चुप-चाप खिच'
लागै छै
,
जकर चरणक धुल इलाका कए लोग माथ लगबै छल
,
अपन बेटा कए चरण पकड़ै लए विवश भ'
जाइ छै
,
ताहि पर जै कोनो बिमारी भ'
जाइ
,
सोचू जौँ लकवा मारि जाइ
,
त'
केहन हाल हेतै
,
सच मे मनुष्यक जीवन मखानक पात छै
,
५
कविता -
हरियर गाछ
बाबा हरियर गाछ होइ छै ,
हुनक बेटा डाढ़ि-पात होइ छै ,
सुरूजक रौद सब पर पड़ै छै ,
फल-फुल पोता-पोती होइ छै ,
तैयो हरियर गाछ काटै छी ,
अपने हाथे बाबा कए मारै छी ,
गाछ काटि प्राणवायु कम करै छी ,
मौसम कए मारि अपने सहै छी ,
बेटा-पोता लए मौत लिखै छी ,
समाजक नाश अपने करै छी ,
" अमित " किय हरियर गाछ काटै छी . . . । ।
४
आनन्द झा
गीत
गै माए
गै माए कोरामे उठा ले हमरा, ह्रदयसँ लगा ले
आएल छी तोरा शरणमे चरणसँ लगा ले
गै माए........................................................
हमहूँ तोरे सखा छी, भटकि हम गेल छी
माया आ लोभमे, सहटि हम गेल छी
गै माए आँचरमे नुका ले हमरा नयनमे समा ले
गै माए............................................................
माँ नै कुमाता होइ छै, हमहीं कपूत छी
हमरा बिसर नै एना, हमहूँ तोरे पूत छी
गै माए दया तों देखा दे हमरा डुबैसँ बचा ले
गै माए............................................................
दस हाथ बाली मैया , कते के बचेलौं
हमरा बेरमे जननी नजरि फेर लेलौं
गै माए एक बेर फेर अपना करेजासँ लगा ले
गै माए.........................................................
डेगे डेगे दुनियां हमरा, ठोकर मारैए
आँखिसँ नोर झहरए, रोकलो नै जाइए
गै माए टुटल आनंदक तों आस फेर बन्हा दे
गै माए........................................................
५

जगदानंद झा 'मनु'
कविता –
सभसँ आगु आगु छी
के कहैत अछि निर्धन छी हम
थाकल हारल मारल छी
हम छी मैथिलपुत्र
दुनियाँ मे सभ सँ आगु-आगु छी
देखू श्रृष्टिक संगे देलौंह
विदेह, जनक, जानकी हम
आर्यभट्ट, चाणक्य
दोसर नहि, बनेलौंह हम
पहिल कवी श्रृष्टिक
वाल्मीकि बनौलक के
कालिदासक कल-कल वाणी
छोड़ि मिथिला दोसर देलक के
विद्यापति आ मंडन मिश्र सँ
छिपल नहि ई विश्व अछि
दरभंगा महाराजक नाम
भारतवर्ष मे बिख्यात अछि
राष्ट्रकविक उपाधि भेटल जिनका
मैथिलीशरण मिथलेक छथि
दिनकरकेँ जनै छथि सब
यात्री छुपल नहि छथि
कुवर सिंह आ मंगल पाण्डे
फिरंगीक सिर झुकौने छथि
गाँधीजी असहयोग आन्दोलन
एहिठाम सँ केने छथि
देशक प्रथम राष्ट्रपति भेटल
मिथिलाक पानिक शुद्धि सँ
दिल्लीकेँ बसेलक कहू
ए.एन.झाक बुद्धि सँ
आई.आई.टी.मे अधिकार केकर अछि
मेडिकल हमरे अन्दर अछि
विश्वास नहि हुअए तँ आंकड़ा देखू
सभटा आई.ए.एस हमरे अछि |
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