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प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य

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c)२००४-१२.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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१.ओमप्रकाश झा- किछु गजल २.प्रभात राय भट्ट ३.शान्तिलक्ष्मी चौधरी

१.

ओमप्रकाश झा


गजल

चढल फागुन हमर मोन बड्ड मस्त भेल छै।

पिया बूझै किया नै संकेत केहन बकलेल छै।

रस सँ भरल ठोर हुनकर करै ए बेकल,

तइयो हम छी पियासल जिनगी लागै जेल छै।

कोयली मधुर गीत सुना दग्ध केलक करेज,

निर्मोही हमर प्रेम निवेदन केँ बूझै खेल छै।

मद चुबै आमक मज्जर सँ निशाँ चढै हमरा,

रोकू जुनि इ कहि जे नै हमर अहाँक मेल छै।

प्रेमक रंग अबीर सँ भरलौं हम पिचकारी,

छूटत नै इ रंग, ऐ मे करेजक रंग देल छै।

सरल वार्णिक बहर वर्ण १८

फागुनक अवसर पर विशेष प्रस्तुति।

गजल

अन्हारक की सुख बुझथिन इ इजोतक गाम मे सदिखन रहै वाला।

दुखे केँ सुख बना लेलक करेजक घातक दुख चुपे सहै वाला।

जमानाक नजरिक खिस्सा बनल ए आब तऽ करेज हमर सुनू यौ,

हुनकर नजरि कहाँ देखलक हमर करेजक इ शोणित बहै वाला।

कहै छै लाजक नुआ मे मुँह नुकौने रहल दुनियाक डर सँ अपन,

इ रीत अछि दुनियाक, तऽ एतऽ किछ सँ किछ कहबे करतै कहै वाला।

करू नै प्रकट अपन सिनेह मोनक, यैह हमरा ओ कहैत रहल,

किया हम राखब उठा केँ समाजक जर्जर रिवाज इ ढहै वाला।

अहाँ डेग अपन उठेबे करब कहियो हमर मोनक दुआरि दिसक,

बहुत "ओम"क बहल नोर, दुखक गरम धार मे गाम इ दहै वाला।

मफाईलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) ५ बेर प्रत्येक पाँति मे।

गजल

अहाँ केँ हमर इ करेज बिसरत कोना।

छवि बसल मोन मे आब झहरत कोना।

हवा सेहो सुगंधक लेल तऽ जरूरी,

बिन हवा फूलक सुगंध पसरत कोना।

अहीं टा नै, इ दुनिया छै पियासल यौ,

बिन बजेने इ चान घर उतरत कोना।

जवानी होइ ए नाव बिन पतवारक,

कहू पतवारक बिना इ सम्हरत कोना।

हमर मोन ककरो लेल पजरै नै ए,

बनल छै पाथर करेज पजरत कोना।

मफाईलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) ३ बेर प्रत्येक पाँति मे।

गजल

चलल बाण एहन इ नैनक अहाँक, मरलौं हम।

सुनगल इ करेज हमर सिनेह सँ बस जरलौं हम।

भिडत आबि हमरा सँ, औकाति ककरो कहाँ छै,

जखन-जखन लडलौं, हरदम अपने सँ लडलौं हम।

हम उजडल बस्ती बनल छी अहाँक इ सिनेह सँ,

सिनेहक नगर मे सदिखन बसि-बसि उजडलौं हम।

हम तँ देखबै छी अपन जोर मुँहदुब्बरे पर,

कियो जँ कमजोर छल, पीचि कऽ बहुत अकडलौं हम।

अहाँ डरि-डरि कऽ देखलौं जाहि धार दिस सुनि लिअ,

सब दिन उफनल एहने धार मे उतरलौं हम।

फऊलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ)--- ५ बेर प्रत्येक पाँति मे।

गजल

मधुर साँझक इ बाट तकैत कहुना कऽ जिनगी बीतैत रहल हमर।

पहिल निन्नक बनि कऽ सपना सदिखन इ आस टा टूटैत रहल हमर।

कछेरक नाव कोनो हमर हिस्सा मे कहाँ रहल कहियो कखनो,

सदिखन इ नाव जिनगीक अपने मँझधार मे डूबैत रहल हमर।

करेज हमर छलै झाँपल बरफ सँ, कियो कहाँ देखलक अंगोरा,

इ बासी रीत दुनियाक बुझि कऽ करेज नहुँ नहुँ सुनगैत रहल हमर।

रहै ए चान आकाश, कखनो उतरल कहाँ आंगन हमर देखू,

जखन देखलक छाहरि, चान मोन तँ ओकरे बूझैत रहल हमर।

अहाँ कहने छलौं जिनगीक निर्दय बाट मे संग रहब हमर यौ,

अहाँक गप हम बिसरलहुँ नहि, मोन रहि रहि ओ छूबैत रहल हमर।

मफाईलुन (ह्रस्व-दीर्घ-दीर्घ-दीर्घ) - ५ बेर प्रत्येक पाँति मे।

प्रभात राय भट्ट

गीत:-विरह

आबू हमरा लग आबू पिया निरमोहिया // मुखड़ा

सेनुरक लाज रखु हमर पिया सिनेहिया//२

कतय गेलहुं हमर प्रीतम चितचोर

अहाँक इआदे नैना बरसैय मोर

जिब नै सकब अहाँ बिनु हम सजना

घुईर चली आबू पिया अपन अंगना

आबू हमरा लग आबू पिया निरमोहिया //

सेनुरक लाज रखु हमर पिया सिनेहिया//२

पल पल हम मरि मरि जिबैतछी

घुइट घुइट आइंखक नोर पिबैतछी

घुईर आबू सुनिक हमर वेदनाक स्वर

करजोरी विनती करैतछी पिया परमेश्वर

आबू हमरा लग आबू पिया निरमोहिया //

सेनुरक लाज रखु हमर पिया सिनेहिया//२

अहिं हमर मथुरा काशी मका मदीना

अहाँ बिनु नहीं अछी हमरा जिनगी जीना

चिर निंद्रा सं जागी आबू कलक मुह सं भागी

समसान सं उठी आबू कब्रस्तान सं निकली आबू

आबू हमरा लग आबू पिया निरमोहिया //

सेनुरक लाज रखु हमर पिया सिनेहिया//२

आस नहि तोडू पिया साँस रहिगेल बड़ कम

जौं कनियो देर करब निकली जाएत हमर दम

निकली जाएत हमर दम....................

पिया ...........पिया ........मोर पिया.....२

आबू हमरा लग आबू पिया निरमोहिया //

सेनुरक लाज रखु हमर पिया सिनेहिया//२

रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

2.

गजल

अहाँ सं हम प्रगाढ़ प्रेम करैत छी

अहाँ किएक अपराध बुझैत छी

जिन्गी अछी हमर अहींक नाम धनी

हमरा किएक बदनाम बुझैत छी

हमर आँखी अहांके दुलार करैय

नैन किएक हमरा सं झुकबैत छी

अछी मोनक मिलन प्रेमक संगम

अहाँ किएक प्रेम इन्कार करैत छी

हम छोड़ी देलहुं सब काज सजनी

बस अहींक नाम लिखैत रहैत छी

बिसारि देलहुं हम अलाह ईश्वर

प्रेम केर हम इबादत करैत छी

प्रेम छै पूजा,छै प्रेम सच्चा समर्पण

अहिं कें हम अपन जिन्गी बुझैत छी

................वर्ण -१४...................

३.

शान्तिलक्ष्मी चौधरी

ल १

सोचै छी हम एकबेर बनि जैतिहौं जँ फेर सँ नेनाभुटका बच्चा

टहैलि आबितिहौं बाड़ि-झाड़ि, खादि-खन्नर, पोखरि, डाबर, चभच्चा

खेलैबतिहौं नरकैटक बन्दुक, बजैबितौं केरापातक पिपही,

घसि-घसि बनैबतिहौ सीटी-बाजा, उखारि ओंकरल आमक बिच्चा

उछैलितौं, फाँनितौं, घुमितिहौं घुमरि, खेलैबितिहौं करियाझुम्मरि

करितौं हो-हो, बनितौं मरूआक ढ़ेरी, उरैबितौं थालक फुरकुच्चा

चढ़ितिहौं जँ आम, लताम, जामुनक गाछ, झुलितिहौ डारिक झुल्ला

कुतैरतिहौं टिकुला आ फुल्ली-बाति फर, मारितिहौं कच्चा पर कच्चा

घिचितिहौं झोटा-चोटी,, घोलैटितौं भुइयाँ, कनितिहौ हकपुत्तर

साँझ-बाति जँ घुरि अबितिहौं अँगना, मारिते माय, बौसतिहै चच्चा

मनक सेहन्ता मुदा घुमरि-घुमरि रहि जाइ ये मोनेक भीतर

सभटा भs गेल आब ई दुःसपना, जेँ चढ़ल ई यौवन अधखिच्चा

"शांतिलक्ष्मी" शहर-गाम मे देखय बस एक्के रंगक रंगल छीछ्छा

छेटगर होइते पाछु पड़ि जाइ छै टोलक बूरल लफुआ लुच्चा

........

वर्ण २५........

ल २

ओ मुनसा हाथ मे भरल लबलब लबनी लेनै बैसल छै पसीखाना मे

खोंता मे मुँहबेनै बैसल बगराक बच्चा कोनाकेँ छै आस लगैने दाना मे

मौगी जे भिनसरबे गेलय घुरि एखन धरि नै एलय देखै चिलका केँ

नै जानि काजक कत्तै जपाल पड़ल छै जीमीदार घरक जपलखाना मे

हेबै मड़रक मेटिया आ रोटीक दौरी चोरेलकै राति मौगीक सतबेटा

सभकियो लपड़ावैत थपरावैत घिचकेँ लs जाइत छै गामक थाना मे

भागक राजा निसाँ मे उठलै टग्गैत, झुकैत, ऐठैत, अकरैत, खखसैत

कंठ फँसल सुलय भाष केँ जोड़ै छै आँखिक तीर तरुआरि बला गाना मे

मौगीक सौतीन, नै जानि के छीयै अइ सलीम केर खुआबक अनारकली

संग जकरा लै मस्त पड़ल छै रस्ता कातक रातिक पसरल पैखाना मे

"

शांतिलक्ष्मी"यो केँ नियमक आड़ि तोड़ि मस्ती लुटब बुझाइत छै बड़ सस्त

बड़ा कठिन छै यौ मुदा संयम मे बसनाय, रहनाय अपन सीमाना मे

.......

वर्ण २८........

गजल ३

कोबी, टमाटर, भट्टा, ये लय आर जाय जैइबै मिरचाय ये

लहसुन हरदि उहो छै, ये सुनय आर जाय छीयै माय ये

ये गिरहतनी लय जैइबै त बाजु सुभिते मे दै देब आइ

चिजो भेटत एकलम्बर, एक्को चिज नै भेटत अधलाय ये

कोबी टमाटर धानक तीन खुटे, भट्टा मिरचाय फाँटि कय

अल्लु चलु बरोबरि, मुदा हरदीक लागत नकत पाय ये

हे गिरहतनी फाs लत तै लइये लेबय की करी दाम कम

आढ़त जेइबै पता चलत कोना आगि फेकय मँहगाय ये

हे माय कटहर नै किनलियै ओतहे चालीस के रहै किल्लो

अहाँसीन सेहो एक-दुइ किनै पुज्जी कोना दितिहै फँसाय ये

"

शांतिलक्ष्मी" सोचय काल्हि चाहा-चिड़ै जकाँ भल्हों होइ अलोपित

कुजरनीक बोली आइ गामक छीये बड़ अनुप मिठाय ये

.......

वर्ण २३.........

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।