Online TransLiteration by girgit.chitthajagat.in, of http://www.videha.co.in/new_page_20.htm Disclaimer
You may also see this page in Bangla, Devanagari, Gujarati, Gurmukhi, Kannada, Malayalam, Oriya, Roman(Eng), Tamil, Telugu
logo logo

वि दे ह

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक गद्य

India Flag Nepal Flag

(c)२००४-१२.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

वि दे विदेह Videha बिदेह http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Read in your own script Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू।

जगदानन्द झा 'मनु'

चोनहा

(धारावाहिक मैथिली कथा )

चोनहा

एक गोट एहन स्वाभिमानी किशोरक मर्म कथा,जए अपन माय-बाप कए कनिक लापरवाही कए कारण घोर अन्हार एवं अपार दर्दक दुनियाँ मे चलि गेल | मुदा अपन सहाश व् कुषार्ग वुधि कए द्वारा ओ ओहि घोर अन्हार एवं दर्दक छाया सँ बाहर निकलि,एक सुखद एवं प्रकाशमान जिवन मे चरण बधेलक |

पहिल दु भाग मे अपने पढलौंह - कोना मासूम किशोर संजय कए असहाय माथक पीरा सँ नित्य सामना करय परैक | सब कए सब होएतो ओ निदान्त एसगर, कियोक ओकर इलाज अथवा कष्ट निवारण हेतु प्रयास नहि कएलथि | गाम सँ दिल्ली आएल मुदा सब कए सब ओनाहि, दिल्लीक गर्मी सँ पीरा मे आओर वृद्धि, अपार कष्ट, मुदा सब किछ असगर सहैक लेल बाध्य | अंत मे ओकरा स्वं एही बताक ज्ञान भेलैक जए ओकर आँखि बहुत कमजोर छैक परञ्च ओकर सहायता करै कए जगह ओकरा कोना 'चोनहा' नाम सँ अलंकृत कएल गेलैक | कोना एक गोट मसुम बच्चा डॉक्टर सँ चश्मक नम्बर आनि अपन बाबुजी कए देलक, ओकर बादो चश्मा नहि बनि पएलै | अनायास एक दिन चश्मा दुकान देखला बाद ओ कोना स्वं चश्मा बनाबैक निश्चय केलक | कोना ओ वर्तमानक सुख व् सोख कए मारि कs एक-एक पाई चश्मा बास्ते जमा करै लागल | आब आँगा ----

******************************

भाग-३

सब मिला कs डेढ़ सय रुपैया जमा करै मे संजय कए पाञ्च महिना लागि गेलै | नम्बर लेलाक एक डेढ़ महिना बाद सँ ओकर मोन मे पाई जमा करैक बात एलै | कुल मिला कs चश्मक नम्बर अनला छ महिना भs गेलै | मुदा संजय लग एखन तक मात्र डेढ़ सय रुपैया जमा भेलै | ओकर लक्ष्य त दु सय रुपैयाक रहै, मुदा आगुक पचास रुपैयाक बास्ते पता नै कतेक समय आरो लगै | ताँइ ओ निश्चय कएलक जए एतबे सँ दुकान जए, कम भेलै तs आगु देखल जेतै |

अगिला दिन संजय स्कूलक तिफिने मे, स्कुल सँ लालकिला कए बस पकैर कs चाँदनी चौक चश्मा दुकान कए हेतु बीदा भेल | पाञ्च महिना पहिले आएल छल, ताहि कारण किछु दिक्कत सेहो भेलै मुदा पहुँच गेल |

जाहिखन दुकानदार कए चश्माक नम्बर बला पुर्जा देलकै तs दुकानदार देखते बाजल -

" s बड्ड पुरान नम्बर अछी, डॉक्टर सँ नबका पुर्जा बनबा कs लय आबु, किएक त नम्बर बढ़ैत रहैत छैक आ छह महिना तs बहुत बेसी समाय भेलैक |"

दुबारा पुर्जा बनाबै कए निश्चय करैत संजय दुखी मोने ओहिठाम सँ चलि आएल | आई प्रथमे कएतौ बाहर असगरे निकलल रहए, असुबिधो भेलैक | सब सँ बेसी ओकरा बसक नम्बरे नहि सुझाई तैं रैह-रैह कs सब सँ पुछअ परै, कोनोना घर तक सकुशल आएल |

पुनः भोरे-भोर संजय पाहिले जकाँ, रोट्री क्लब संचालित आँखिक अस्पताल त्रिलोकपुरी तिन ब्लोक पहुँचल | तिन दिनक हरानी कए बाद चश्माक नव नम्बर भेटलैक, मुदा जए छह महिना पाहिले माइनस तिन रहैक से आब ठामे दुगुन्ना माइनस छह s गेलैक | छह महिना मे एतेक नम्बर बढ़नाइ एही बताक अंदाजा लगाएल जा सकै छै जए ओकर आँखि कतेक बेसि खराब रहैक वा कतेक बेसि गति सँ खराप भय रहल छैक |

डॉक्टर तs संजय कए एही बात सँ पहिले अबगत करा देने रहथि आ चश्मा तुरँत बनाबैक हिदायत से देने रहथि | मुदा बिधि कए जए मन्जुर |

अगर आबो अपने नहि सचेत होयते तs आगुक छह महिना मे आन्हरे भs जाएत | संजय कए आब बरहल नम्बर कए जानि बर चिंता होबए लगलै | अगिला दिन ओ स्कुलो किएक जाएत, किताबक झोरा लेन्हें सोझें चाँदनी चौक चश्माक दुकान पर पहुँचल | चश्माक नव नम्बरक पुर्जा दुकानदार कए देलक | ओकर आँखिक एतेक नम्बर देखि दुकानदार आश्चर्य सँ -

"हाँ एतेक बेसि नम्बर, अहींक छी की ? "

"हाँ" - संजय धीरे सँ बाजल |

दुकानदार - "किएक एहि सँ पाहिले नहि देखेने रहि की ? इ त साफ-साफ लापरबाहि कए लक्षण थिक - - - माँ बाबुजी नहि छथि की ? ओ हो भगवान एहेन ककरो- - -"

"नै-नै एहन कोनो बात नहि "- दुकानदारक बात बिचे मे रोकैत संजय बाजल |

दुकानदार सेहो अपन बात कए विराम दैत, अलग-अलग डिजाईन कए फ्रेम निकालि-निकालि s देखाबय लागल आ संगे-संगे ओकर दाम सेहो बताबय लागल | फ्रेम सब पर एक नजैर दैत संजय बाजल -

"हम बिद्यार्थी छी आ हमरा लग कुल डेढ़ सय रुपैया अछी, एही दाम मे कोनो मजबूत आ टिकाऊ फ्रेम देखाबु |"

"ठिक छै " - कहैत, दुकानदार सेफ कए एक कोना सँ एकटा साधारण परञ्च मजबूत फ्रेम निकालि कs दैत बाजल -

"इ लिय अहाँ एहेन बच्चा लेल इ बहुत उचित छै, मजबूत टिकाऊ आ दामो मात्र पछ्तरे रुपैया, पचास रुपैया कए सीसा अर्थात कुल सबा सय रुपैया लागत |"

"ठिक छै एकरे बना दिय |"- संजय खुसि सँ बाजल, किएक तs ओकरा अंदेसा छलैक रुपैया कम होएत, आ कतय पचीस रुपैया बैंचे गेलैक |

दुकानदार - "ठीक छै तs पाई जमा कय दियोउ, काइल्ह आबि कs चश्मा लय जायब |"

संजय दुकानदार कए एक सय पचीस रुपैया देलाबाद बिल लय ओहिठाम सँ बिदा भs गेल | बिल पर देखलक दुकानक नाम 'लक्ष्मी आप्टिकल' लिखल रहैक | साइन-बोर्ड पर लिखल नाम तs ओकरा सुझले नहि रहै |

बस पकैर घर आएल | आई ओकर मोन किछ शांत रहैक | घर पर इ बात सब केकरो लग नहि बाजल | ओकर मोन मे तs हलचल मचल रहैक कखन भोर होई आ जल्दी-जल्दी चश्मा आने |

भोरे संजय उठी सब दिन जेकाँ नहा-सुना कs स्कुल गेल | स्कुल कए छुट्टी भेला बाद, सोझे स्कूले सँ लालकिला कए बस पकैर कs चश्मा लेल चाँदनी चौक बिदा भs गेल | चश्मा दुकान पहुँचल, ओकर चश्मा बनि चुकल छलै | चश्मा देखला बाद दुकानदार कए कहलाउत्तर लगाओ कs देखलक |

इ की चश्मा लगेला सँ ओकरा एक नव दुनियाँक दर्शन भेलैक | सब किछु नव-नव | ओ सामने रोडक ओई पारक दुकान सब, दुकान कए भीतर राखल समान सब, दुकान सबहक साईन-बोर्ड पर लिखल अक्षर सब एकदम साफ-साफ बिलकुल स्पस्ट देखा रहल छलैक | एके मिनट मे आई ओकरा ज्ञात भेलैक जए इ महानगर कतेक सुन्नर छैक, जए की आई सँ पहिले कहियो नहि देखने छलै |

लगले ओ अपन आँखि सँ चश्मा निकालि कs खोल मे रखैत जेबी मे राखि लेलक | किएक तs बिना चश्माक आ चश्मा पहिरलाक बादक दुनियाँ कए सन्तुलन करै मे किछु तs समाय लगतै | चश्मा पहिरला बाद सबटा नव-नव लगै, जए-जए बस्तु सब देखाई से-से सब कहियो ओ अनुभबो नहि केने | एही दुरी कए भरै मे तs किछ समय, एक दु दिन तs लगबे करतै | दोसर, दुकान तक बिना चश्मा कए आएल छल आब पहिर कs नव दुनियाँ संगे जए मे असुबिधा छलै | दुकान सँ बाहर निकैल बिना चश्मेक बस स्टेंड तक आयल |

आब कोन बस पर चढ़े ? की ओकरा चश्माक यादि एलेक, चश्मा निकालि कs लगेलक, की ओकर आश्चर्यक सीमा नै रहलैक जतए बिना चश्मा कए सामने ठार बसक नम्बरों नै सुझै छलैक ततए चश्मा पहिर कs समूचा रोड पर जतेक बस गाड़ी रहैक सबहक नम्बर पैढ़ सकै छल |

ओकर मोन इ नव बस्तु सब देखक आनन्दबिभोर भय गेलैक | पाँछा घुमि कs देखलक त सामने छाती तन्ने ठार, विशालकाय लाल पाथर सँ निर्मित सुन्नर लालकिला देखलक, लालकिला कए सुन्नरता एवं मनमोहकता देखकय ओ मन्त्रमुग्ध रहि गेल | किएक त पहिले बिना चश्मा कए त खाली लाल-लाल धुंद जकाँ किछु छैक सेहटा देखाई दै | असली लालकिला त आई चश्मा पहिरलाबाद देखलक | ताबत सामने दूर सँ ओ देखलक, ओकर बस आबि रहल छै, मुदा चश्मा पहिरबाक आदत नहि रहबा कए कारण चलै मे असुबिधा होई तैं फेर सँ चश्मा खोलि जेबी मे रखलक आ बस पर बैसल | बस पर बैसला बाद फेर सँ चश्मा निकालि, एकबेर लगाबे एकबेर निकाले अन्त मे चश्मा निकालि खोल मे दय, बस्ता मे राखि लेलक ताबत मे बस सेहो चलय लगलै |

बस चैल रहल छलैक, आ संजय कए मोन मे सोचक भंवर उठय लगलै -

"एही सबा सय रुपैयाक चश्मा कए अभाबे हमरा एतेक कष्टक सामना करय परल | नहि खला सकै छलौंह , नहि बस पर चैढ़ सकैत छलौंह , नहि ब्लैक बोर्ड पर लिखल हिसाब देख सकैत छलौंह, नहि नीक जँका किताब पैढ़ सकै छलौंह , नहि टी वि देख सकै छलौंह | पढ़ाईयो मे दिन-दिन पिछरल जा रहल छलौंह | मुदा माँ बाबुजी एही बात पर कोनो ध्यान नहि देलनि | एक बेर तs चश्माक नम्बरों आनि कय देलियैंह मुदा धन-सन कोनो कान-बाट नहि | कोना- कोना कुन-कुन हिसाबे अपने एक -एकटा पाई जोरि कs पाञ्च महिना मे इ रुपैया जमा केलहुँ |"

बिचारक मंथन मे डुबल कोना समय बीत गेलै, कोना बस अपन गंतब्य स्थान तक आबि गेलैक, संजय कए किछु ज्ञात नहि ओ तs अपन ध्यान मे डुबल रहे, जखन सब बस सँ उतैर गेलैक तखन ओकर ध्याकं खुजलै आ ओ बस सँ उतरल |

बस सँ उतरला बाद, पएरे चलैत ओकर मोन एक बेर फेर सँ नव समस्या मे ओझरए लगलै -

"चश्मा त लय अनलौं, आब घर मे की कहबै? कतए सँ चश्मा अनलौं? रुपैया कतए सँ अनलौं? कए बना देलक ? "

आन-आन सबाल-जबाब सब ओकरा मोन मे अबै जाई | रस्ता ख़त्म घर आबि गेलै | खेलक-पिलक मुदा ओकर मोन त एही प्रश्नक उत्तर खोजै मे लागल रहैक की -"घर मे चश्मा की कहि कs देखएबै ?"

समय बितलैक, साँझ परलै संजय सेहो नव मोर्चा सम्भालैक किछु उपाय सोचलक |

संजय कए बाबुजी सेहो ड्यूटी सँ एलाह, नितकर्म सँ निवृत भेलाबाद माँझ आँगन मे खाट पर बैसलाह | संजयक माय व् छोट दुनु भाई हुनके चारुकात बैसल | संजय सेहो अपन जेबी मे चश्मा रखने ओहिठाम बैसल, मुदा बाहर निकालि कs देखेतै से हिम्मत कए अभाब | आन-आन गप सब होइत रहैक, ताहि बिचमे संजय बहुत आत्ममंथन व आत्मदृढ़ता कए बाद अपन सम्पूर्ण सहास कए जुटाबैत जेबी सँ चश्मा निकालि बाबुजी कए देलकैन्ह |

बाबुजी चश्मा कए हाथ मे लैत -"की छैक "

"चश्मा" संजय धिरे सँ माथ झुकोने बाजल, आगु अपन सेफ कए गरदैन सँ निचा घोंटैट बाजल - "आइ फेर सँ स्कुल मे डॉक्टर आएल रहैक, हमर चश्मा नै बनल ताहि कारण बहुत बाजल, कहलक पहिले सँ दुगुना बेसि आँखि खराब भय गेलैए, अंत मे ओहे डॉक्टर अपने लग सँ चश्मा देलक |" इ बात ओ एतेक फटाफट बाजल जेना कियो गोटा ड्रामा मे रटल- राटायल शब्द फटाफट बाजि जाइये |

हलाँकि ओ उपरोक्त सब बात फुसिए बाजल, किएक त बच्चाक मोन अपने ओतेक कस्ट सहि चश्मा बनबेलक मुदा ओकरा सामने आनै लेल किछु नै किछु तs कहैए परतैक | झूठो बाजि कs अपन आँखिक रक्षा केलक | जए काज ओकर माय-बाबु कए करए चाहियैंह से काज ओ मासुम बच्चा अपने कएलक मुदा इ कोनो एतेक भारी झूठ नहि भेलै जए पकरल नहि जए | चश्माक खोल पर साफ-साफ दुकानक नाम पत्ता लिखल रहैक, लक्ष्मी ओप्टिकल, दुकान नम्बर फलाँ-फलाँ - - - चाँदनी चौक दिल्ली छह | आ इ कियो एक गोट सामान्य बुद्धिक व्यक्ति जनै छै जए एक निजी दुकान मंगनिमे चश्माक वितरण किएक करतैक, कोनो सरकारी या धर्मार्थ संस्थाक नाम होएतैक तs कनि बिस्बासो कएल जा सकै छलैक | मुदा एहिठाम एहन कोनो बात नहि |

दोसर चश्मा बनेनाइ कोनो चुटकी कए काज s नहि छैक ? नम्बरक सीसा कए काटि-छाँटि कs,घैन्स कs फ्रेम कए मुताबिक बनेनाइ,जए की एक गोट वर्क-शॉप मे भय सकैत छैक, नै की कोनो डॉक्टरक जेबी मे | परञ्च बाबुजी कए संजयक बात पर बिश्बास भय गेलैन | सैदखन पहिरै कए निर्देश दैत, बस ! आगू कोनो बात-चित नहि |

कनिकाल लेल मानि लेल जए, छह महिना पहिले जखन संजय हुनका हाथ मे चश्मा कए नम्बर दएने रहैन तखन ओ कोनो कारने चश्मा नहि बना पएलनि, मुदा आबो त सामने देख रहल छथिन जए कतेक मोटक सीसा कए चश्मा ओकर आँखिक उपर छै | आबो त अपन पहिलुक गलती सुधारि सकै छलैथ | कतौ कनि निक डॉक्टर सँ ओकर आँखिक इलाज करा सकै छलैथ | दिल्ली मे त एक सँ एक पैघ-पैघ अस्पतालक लाइन लागल छैक | कतय धिया-पुता कए आँखि मे एकटा कीड़ा पैर जाएत छैक त ओकर माय-बाप कए आत्मा तर्पय लगै छैक, आ कतय एक गोट माय-बाप कए बच्चाक आँखिक ऊपर माइनस छह कए चश्मा लागि गेलै आ धन-सन |

आब संजय सैदखन आँखि सँ चश्मा लगोने रहे, स्कुल, हाट-बाजार,रस्ता-घाट कतोउ बिना चश्माक नहि जए | पहिले दु-चारि दिन किछु असुबिधो भेलैक, मुदा बाद मे अभ्यास भय गेला पश्चात सब ठिक | चौबीस घंटा मे जेतबे काल राति मे सुतल तत्बेकाल ओकर आँखि सँ चश्मा निकलै, कहियो क त चश्मे पहिरने सुतियो रहे |

संजय कए चश्मा लेला पुरे दु वर्ष भय गेलैक, आ आइये ओकर दसम वर्गक परीक्षा परिणाम घोषित भेलैक ओ नीक अंक सँ पास केलक | परीक्षा परिणाम जनलाबाद ओकर मोन रिजल्टक चिंता सँ किछु हल्लुक भेलैक,किछु शांति सँ बैसल रहए की ओकर मोन रूपी घोरा, जीवनक सात-आठ वर्ष पाछु चैल गेलैक | कोना- कोना ओकरा कष्टकारी माथ दर्द होई, कोना गाम पर माथ दर्द सँ अँगना मे ओंघडिया मारए आ कियो ओकरा देखनाहर नहि | दिल्ली आएल मुदा दिल्लीयो मे इ जानलेबा असहाय माथ दर्द कोनो कम नहि, दिन सँ दिन बेसिए परेसान केलकै |

कि एकाएक ओकर मानसपटल पर कतौ सँ अबाज एलै -

" ई की बहुतो दिन सँ तs माथ दुखेबे नहि केलक, कहिया सँ, दु वर्ष सँ, हाँ -हाँ दुवे वर्ष सँ, जहिया सँ चश्मा लेलौंह तहिये सँ, हाँ-हाँ जखन सँ चश्मा पहिरब सुरु कएलौंह तखने सँ इ असहाय जानलेबा माथ दर्द ठिक अछी | इ दु वर्ष मे एको बेर माथ दर्द नहि भेल | त कि जए एतेक असहाय माथ दर्द सात-आठ वर्ष वा ओहु सँ पहिले सँ होई छल से आँखिक कमजोरिक कारने, हाँ ! शायद -- शायद कि पक्का - - पक्का हाँ ! आँखिक कमजोरिक कारने ओतेक माथ दर्द होएत छल |"

जान लेबा माथ दर्द ओकर सुमरण मात्र सँ सनजय कए समुचा देह मे कपकपी भय गेलै | जेना-जेना आँखिक कमजोरी बढ़ल जए तेना-तेना ओकर माथक दर्द बिकराल रूप धारण केने गेल रहै | मुदा कियो कोनो डॉक्टर सँ देखाबय बला नहि | इ बात सब सुमैरते ओकर दुनु आँखि सँ नोरक धारा बहए लगलैक | मुदा तैयो ओकर सोचक बिराम नहि होई छैक, ओकर बिचार रूपी घोरा लगातार अपन पथ पर सरपट दौर रहल छैक -

"आह ! अगर सात-आठ वर्ष पहिले, कम सँ कम दिल्लीयो एला बाद कोनो नीक डॉक्टर सँ हमर माथ दर्दक इलाज भेल रहिते, किएक ओ ओतेक कष्ट व् पीड़ा सहय परितए, आ किएक आई एतेक मोट सिसाक चश्मा आँखि पर पहिरए परितए, जएकर बिना कि एक तरहे आन्हरे छी | इ कएकर दोष ? हमर ? हमर समाज कए ? हमर माय-बाप कए ? कि हमर कपार कए ? यदि एतबो पर हम अपने नहि सचेत भेल रहितौं त आई दसवी पास करै कए जगह एक भयंकर अन्हारक दुनियाँ मे विलीन भय गेल रहितौ |"

संजय कए विचारक घोरा बिराम लेलकै कि नहि ? मुदा समाज कए सामने एकटा यक्ष प्रश्न छोरि गेलैक-

माय-बाप कए कर्तव्य अपन संतानक प्रति की हेबा चाहि ? भोजन,कपड़ा-लत्ता - - -की आगुओ किछ ? आगु की -की ? ? ?- - -

ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।