वि दे ह विदेह Videha बिदेह http://www.videha.co.in विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA.Read in your own script Roman(Eng) Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
१.जगदीश
प्रसाद मण्डल
२.
अनिल
मल्लिक-
गीत-गजल
१
जगदीश
प्रसाद मण्डलक
नौटा
कविता-
घोड़ मन (भाग- 1)
घोड़ मन घोड़छान तोड़ि
चौदहो लोक भरमए लगल।
सातो-सोपान पताल टपि
सातो अकास उड़ए लगल।
समए संग जहिना बिलगैए
मिसरी-मक्खन ओ िनर्मल जल
हंसा उड़ि परमहंसा बनि-बनि
तहिना उड़ैत मन देह-स्थल।
स्थूल-सूक्ष्म बॅटि-बॅटि जहिना
दृश्य-भाव कहबैए।
एक्के आँखिये दुनू देखै छी।
अचेत मन भरमैए।
निकलि देह धारण करैए
आत्म-परमात्म दर्शन पबैए।
पबिते दर्शन मगन भऽ भऽ
सूर-तान, वीणा धड़ैए।
मथिते मथानी जहिना
घी-पानि बिलगए लगैए।
जले बीच दुनू समाएल
उठि एक सिर चढ़ए लगैए।
लोहिया चढ़ल आगि बीच जहिना
मक्खन नचए लगैए।
काह-कूह फेकि-फेकि
पेनी बीच बैस जमैए।
घोड़ मन (भाग-2)
गोबर घोड़ाइते पानि जहिना
गोबराह रूप धारण करैए
गोबरेक गंध पसारि-पसारि
गोबरछत्ता बनि-बनि छितिराइए।
सुविचार कुविचारो तहिना
छने-छन छीन होइत चलैए।
गिरगिट रंग पकड़ि-पकड़ि
गिरगिटिया चालि चलए लगैए।
गिरगिटिया मनुक्खो तहिना
दिन-राति बदलैत चलैए
गीरगिटेक जहर सिरजि-सिरजि
बीख उगलैत चलैए।
भेद-कुभेद मर्म बिनु बुझने
देखा-देखी ओढ़ैत चलैए
ओढ़ि-ओढ़ि ओझरा-पोझरा
डुबकुनिया काटि मरैए।
गाछक उपर डारि बीच जहिना
बॉझी अपन बास करैए
झड़मनुखो मनुख बीच तहिना
उपरे-उपर चालि मारैए।
सात समुद्र बीच मनुख
दसो दिशाक दर्शन पबैए
चीन्हि-पहचीन्हि केने बिना
जिनगीक बाट पकड़ैए।
घोड़ मन (भाग-3)
प्रकृतोक तँ प्रकृत गजब छै
सुगंध-कुगंध फूल खिलबैए।
सु-पारखी सुरखि-परखि
कु-पारखी दिन-राति मरैए।
परखिनिहारो परखि कहाँ
परखि-परखि बिलगा चलैत
धार-मझधार बीच
पिछड़ि-पिछड़ि नहिये खसैत।
बेबस मन बहटि-बहटि
सीरा-भट्ठा बिसरए लगैत
जान बॅचबैक धरानी कोनो
लपकि-लपकि पकड़ए चाहैत।
सत्ताक भत्ता छिड़िआएल छै
फानी, फनकी बनि लागल छै।
चिड़चिड़ीक फड़ जकाँ
चूभि पएर टीको नोछड़ै छै।
बिनु पाँखिक हंसा जहिना
तीनू लोक विचरण करैए।
दिन-रातिक भेद बूझि-बूझि
अज्ञान-ज्ञान-सज्ञान बनैए।
घोड़ मन (भाग-4)
आँखि मिचौनी पाश बैस
ब्रह्म-जीव माया खेलैए।
समए पाबि तहिना ने
अज्ञानो-सज्ञानक चालि चलैए।
होइत आएल आदियेसँ
अज्ञान-ज्ञान बीच संघर्ष
ताधरि चलिते रहत
जाधरि अन्हार इजोत बनत।
पछुआ छोड़ सम्हारि-सम्हारि
अगिला पकड़ैत चलू।
अतीत केर स्मृति बना
समद्रष्टा बनैत चलू।
एक छोड़क बाट देखि
भूत-वर्तमान देखैत चलू।
भविष्य तँ भविष्ये छी
भविष्य-वर्तमान बनबैत चलू।
डेंगी नाह जहिना यात्री
धार पार करैए।
डगमगाइत देह मड़मड़ाइत मन
जीवन धाम पहुँचैए।
अलकक चान
अबिते गाम चमकए लगलै
ताकि तरेगन बिछए लगलै।
ज्योति मिला परखि-परखि
अकास सिर सजबए लगलै।
रंग-बंरंगक तारा सजल छै
लग-पासक संग सेहो हटल छै।
कोणे-काणी सजि-धजि
मोती-कंचन माला बनल छै।
धूप-छाँहक पाश पाबि-पाबि
नब-पुराणक भेद मिटल छै।
धाम ज्ञानक चोला पहिरि-पहिरि
शब्द–शब्दक जाल पसरल छै।
मुर्ति जखन कागज उतड़ि
रूप भगवान धारण करै छै।
झड़ि-झड़ि झहड़ि असल
नकल रूप धड़ए लगै छै।
जहिना कार्बन काॅपी होइ छै
नकल कार्बन चढ़ए लगै छै।
तहिना अरूप सरूप संग
चुट्टी चालि चलए लगै छै।
जहिना मुसक चालि पकड़ि
मुसरी सेहो घुसकए लगै छै।
जाल-महजाल पकड़ि-पकड़ि
पकड़ि सुत कॉटए लगै छै।
आदिक दुहाइ लगा-लगा
आधि-व्याधि सिरजए लगै छै
मकड़-जालक रूप गढ़ि-गढ़ि
अपने चालिये फँसए लगै छै।
अकलक चान हाॅसू पकड़ि
खल-खल सतमी पार करै छै।
अट्टहास अष्टमी केर पबिते
नब-रंग नवमी कहबै छै।
पबिते नौमीक चान अकलक
पूवो दिस ससरए लगै छै।
पुवोक परताप पकड़ि-पकड़ि
पूर-चान कहबए लगै छै।
एक चान यमुना उतड़ि
महल ताज देखए लगै छै।
दोसर चान पून्यात्मा बनि
आत्म लोक बिचड़ए लगै छै।
डेग-डेग दर्शन पबैत,
डेगे-डेग ससरए लगै छै।
उड़ि अकास धरती पकड़ि
चान-सूर्ज कहबए लगै छै।
प्रीत-रीति पकड़ि-पकड़ि
अपन-अपन बेथा गबै छै
राग-रागिनि राग भरि-भरि
प्रेमाश्रु धार बहबै छै।
जमुनाक जल बनि-बनि
नीर सरस्वती चढ़बै छै।
गाड़ा-जोड़ी करैत दुनू
गंगा बाट बनै छै।
तीनू मिलि तिरवेणी कहबए
सूर-तान-राग भरै छै।
आलाप-परलाप भरैत-करैत
परियाण परियाग करै छै।
गीत
भाेरे कने जगा देब,
भोरे कने जगा देब,
भाय यौ भोरे कने जगा देब।
जुग-जुगसँ मोटका नीन धेलक
सिरमा तरक सभ किछु लेलक।
आबो कने जगा देब,
भाय याै आबो कने जगा देब।
इन्दिरा अवासमे नाओं लिखेतै
सिमटी-ईटा केर घरो बनतै।
झाँटक झटकी किछु ने करतै
भोरहरबे कने जगा देब
भाय यौ भोरहरबे कने जगा देब।
सात कोस पएरे जए पड़तै
ब्लौकेमे शिविर लगतै,
ओतै नाओं लिखेतै,
भाय यौ, भोरे कने जगा देब...।
प्रेमी पिया
प्रेमी पिया, हे प्रेमी पिया
पीरितिया जोगा-जोगा, हृदए रखियौ जीया
हे यौ प्रेमी पिया....
तड़सि-तड़सि मन तड़पि रहल अछि
आस लगा बाट खोजि रहल अछि
नजरि उठा आबो कने, ताकि तकियो हिया
हे यौ प्रेमी पिया....
चीन्ह–पहचीन्ह सभ, सेहो उड़िया गेल
हवा केर झोंक पाबि, सभ छिड़िया गेल
आबो कने नजरि उठा, दिअ हमरो जीया
हे यौ प्रेमी पिया....
सभ दिन संगे मिलि दुनू रहलौं,
सुख-दुख सेहो संगे मिलि कटलौं।
छाती खोलि सहेजि-सहेजि,
दिल दिलेरि घड़ू पीरितिया
हे यौ प्रेमी पिया...।
शील
द्रवित होइत पानि जहिना
सुख-शील रूप धड़ैए।
तहिना ने गाछो-बिरीछ
फल जीवन, मृत्यु सुख बॅटैए।
जे सृष्टि सिरजए वन-सागर
सएह ने सिरजैत वन-मनुख।
बनि मनुष्य बनबास करए जौं
पबैत राम गुण, शील मनुख।
लस्सा-दूध नाम धड़ए एक
दोसर सागर-सरोवर कहबै छै।
लहू कहि-कहि जीव धड़ए
वनमानुख खून मनुष्य कहबै छै।
सुखा खून अपन अस्तित्व
शील-सिरजक कहबैए।
शीले तँ रूप सु-भावक
बढ़ि रूप गुण पबैए।
पबिते गुण भव-सागरमे
गुणी बनि गुण खिंचैए।
छाती लगा बान्हि बाँस
रस्सीक संग सटैए।
शील जखन गुण बनैए
मनुख गुण खिंचए लगैए
गुणी बनि गुदगुदबैत मन
जीवन सुख संचार करैए।
कखनो रस्सा-कस्सी करैत
कखनो ढील-ढाल चलैए।
शीतल-समीर पाबि कखनो
संगे-संग विश्राम करैए।
दिन-रातिक बीच समीर
कुरूक्षेत्र कहबए लगैए।
उनटि-पुनटि, ओंघरा-पोंघरा
रणभूमि सिरजए लगैए।
जे फल पाबि राम बनबौलनि
समुद्र बीच सघन पुल।
तहियेसँ उड़ए लगलनि
रस्ता-बाटक मिझिराएल धूल।
सएह फल पाबि रचलनि कृष्ण
भारतसँ बनैत महाभारत।
हिमालयसँ समुद्र
आ समुद्रसँ कैलाश महादेव
वएह थिक हमर भारत।
भरत बनि भ्रमैत भॅबर
चरण-सिर धड़ैत जहिना
सएह चरण सुरसरि सिरजि
शिव-कैलाश समाएल जहिना।
पी-घैल पाथर जहिना
पाथर वर्फ कहबए लगै छै।
सिरजि शील शीला बनि-बनि
शीला पत्थर कहबए लगैए।
नब रूप सिरजि-सिरजि
जल रूप धारण करैए।
बनि जल-कण उड़ि उकास
हवा संग झुमैत चलैए।
प्रेमी-प्रेमिका बीच दुनू
अश्रु-कण बिलहैत चलैए।
वएह कण-कणाइत बढ़ि
ओस बनि धरती सिंचैए।
धरिते धड़ा-धरती कन्हुआ
हाथ दुनू छाती सटबैए।
मिलि दुनू सिंगार सजि
वसुदेव रूप धारण करैए।
बनि वसुन्धरा बनि बसुदेव
धार-धाराक धारण धड़ैत।
पबिते जल जलधार बीच
राइ-पहाड़ रूप सजबए लगैत।
बीच-बीच बाट-घाट बनि
रूप श्रृंगार सजबए लगैए।
एक घाट दोसर नदी बनि
झील, सरोवर सागर सिरजैए।
झिलहोरि झील खेलाइत रश्मि
आकर्षित-आकर्षण करैए।
प्रेमास्पद पबिते पाबि
प्रेम-प्रेमी कहबए लगैए।
पाबि प्रेमी प्रेमी जखन
सागर गंगा मिलए चाहैए।
बॉसक पुल बना समुद्र
गंगा-सागर स्नान करैए।
वएह पवित्र जल सागर
कंद पहाड़ बनैए।
बैस कंदरा जोगी-जती
भगवत-भजन करैए।
जहिना भूखल पेट मांगए
तहिना ने मनो मंगै छै।
भोज्यक तृष्णा दुनूक बीच
भजन-भोजन कहबैत चलैए।
बनि शीला समुद्र बीच
पहाड़ बनि-बनि ठाढ़ होइए
शिकारी पहाड़ घूमि-घूमि
मन-माफित शिकार करैए।
सभ दिनसँ होइत आएल
देव-दानवक बीच रग्गड़
रगड़ि-रगड़ि रगड़ैत चलि
मुंडे-मुंड पसरल झग्गर।
झग्गड़ दू दिस चलै छै
एक-रगड़ि सुरधाम बढ़ै छै।
तँ दोसर धरती धारण करै छै।
स्वर्ग-नर्कक विचमानि कऽ
अकास-सँ-धती खसबै छै।
रंग-विरंगक सृजित कऽ
दिशा-हीन बनबए लगै छै।
उपदेशक तँ सभ बनैए
अपना ले की सभ सोचैए।
असार-सार संसार बूझि-बूझि
शील-धरम कहाँ बूझैए।
जिनगीक शील धर्म छी
एक दिन धारण करए पड़त।
राम-नाम सत् छी
अंतिम दिन कहए पड़त।
२
अनिल
मल्लिक
गीत-गजल
१
गीत
एकटा काल खण्ड, एतही जिलौं हम
यथार्थ'क हलाहल, एतही पिलौं हम
मेटायल तृष्णा, यश मान धन के
ओह! क्षुधा कहाँ मेटायल, हमर मन के
यतs चिक्कन रस्ता, बातानुकुलित अट्टालिका, गतिशिल सभकिछ
ओतs खरँजा, खपडा, कडगर धुपमे ठाड ताड'क गाछ, आर नै किछ
शर्द सीसा, उच्छ्वाश'क भाफ सियाही, आँगुर अछि कलम
अहिना महिशारी सॉ मेलबॉर्न यात्रा, लिखैत मेटबैत छी हम
दिग्भ्रमित उदिग्न मन नै अछि, आब स्पष्ट अछि, करब कि
एहन करब, मातृ ऋण सँ उऋण भs जायब, बेसी हम कहब कि
बिरक्त भs आयल छलहुँ, भेटल दुनियाँ रंग बिरंगी
पयलहुँ एतही हुनको, पग पग साथ दैत जिबन संगी
चुपचाप देखैत रहैत छलैथ, असगरे अपना सँ लडैत हमरा
कि भेलै नै जानि, कखैन ओ अओलैथ, देलैथ कन्हा'क सहारा
अश्रुपुरित, बाजि उठलैथ धीरे सँ, आब चलू केओ यतय रहय त रहौ
पलैट क हम देखलहुँ हुनका, चमैक उठल बच्चा जाकाँ आँखि.. ओहो !
मेघाच्छादित भादब मास, घुप्प अन्हार, जेना भेल अचानक प्रकाश चहुँओर
हजारो चिडै के एकसाथ चिडबिड चिडबिड,जेना भs रहल होई नव जिबन भोर
बहुत भेल, पियब नै ई चमकैत हलाहल, आब पियब अमृत प्याला
मन मलङ्ग अछि, चललहुँ हम सभ, बजा रहल प्रेम'क मधुशाला
२
गजल
जखनसँ खसल, आँचर देखलहुँ हम
मोन पर धरल, पाथर पयलहुँ हम
भूख सँ बिलखैत, कोरामे नवजात छलै
नयन मे साओन, भादव देखलहुँ हम
जिन्दा लहाश सभ'क, आँखि चमकैत छलै
मनुख'क भेष मे राक्षस देखलहुँ हम
बुझू जेना घेरने, दुस्साशन के भिड छलै
पाण्डव भेल जेना, आन्हर देखलहुँ हम
तखने दुध, नूआ लेने, आयल एगो बच्चा
ओकरे कृष्ण, युग द्वापर बुझलहुँ हम !!
३
गजल
निशा छटल, निसाँ टुटल, पयलौ घर नै कोठरी छल
पारो छल नव राह पकडने, हारलौ हम जितै बाला
अर्थ'क अर्थ नै बुझलौं ,अनर्थ हेतै कहाँ बुझल छल
सगरो जीनगी बीक रहल अछि, मारी करै कीनै बाला
छद्म छुअन स हर्षित तन आत्मा'क स्पर्श बुझल'क नै
टोकिएै त हमही बौरायल कहाँ
केओ अछि मानै बाला
रंग रभस के भरम मे, छै जे जुआनी उजडि रहल
जीबन रंग लूटि रहल, नित
नव रंग'क मधुशाला
ऐ रचनापर अपन मंतव्य ggajendra@videha.com पर पठाउ।
