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वि दे ह

प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका

मानुषीमिह संस्कृताम्

ISSN 2229-547X VIDEHA

विदेह नूतन अंक पद्य

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(c)२००४-१२.सर्वाधिकार लेखकाधीन आ जतय लेखकक नाम नहि अछि ततय संपादकाधीन।

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१.डॉ॰ शशिधर कुमर २.नवीन कुमार "आशा"

.

डॉ॰ शशिधर कुमर, एम॰डी॰(आयु॰) – कायचिकित्सा, कॉलेज ऑफ आयुर्वेद एण्ड रिसर्च सेण्टर, निगडी – प्राधिकरण, पूणा (महाराष्ट्र) – ४११०४४

जयति जय श्री त्रिपुरारी केर

(आगामी शिवराति पर विशेष)

बम - बम भोलेनाथ, जयति - जय श्री त्रिपुरारी केर ।

त्रिलोचन, चन्द्रधारी केर ना ।।

कर मे त्रिशूल आ डमरू विराजन्हि,

जनिकर अम्बर छन्हि बघछाल ।

गरा मे लटकनि साँप अहर्निश,

संगहि रुद्राक्षक छन्हि माल ।

शम्भू – गिरिजापति, जय नीलकण्ठ, जटाधारी केर ।

गंगा मस्तकधारी केर ना ।।

श्मशान मे राज जनिक छन्हि,

भूत – प्रेत केर संग ।

कान मे कुण्डल, हाथ कमण्डल,

सौंसे देह रमओने भस्म ।

गौरीकान्त, गिरीश, उमापति, जय ऋतुध्वंशी केर ।

उगना मिथिलाविहारी केर ना ।।

वास जनिक कैलाशक ऊपर,

हिमगिरि जनिक तपोवन ।

त्रिपुरासुर केँ मारि खसाओल,

कएल जलन्धर भञ्जन ।

कार्तिक आओर गणेशक तात, रुद्र - असुरारि केर ।

बसहा बरद सवारी केर ना ।।

हिनक भक्त रावण छल रक्तप,

तइयो मान ओकर राखल ।

कयल तपस्या घोर भगीरथि,

मनवाञ्छित फल ओ पाओल।

भोला - भंगिया – शिव - शंकर; भक्तक हितकारी जे ।

विष्णु - चरण पुजारी जे ना ।।

बसन्तक आगमण पर

भेल पुलकित दिग - दिगन्त,

आ खीलि उठल हर अन्तरा

स्वागतहि आगत वसन्तक,

सजि रहल ई वसुन्धरा ।।

कास केर तजि श्वेत अभरण,

पहीरि कुसुमक ललित पहिरन,

कऽ सकल सिंगार हर्षित,

कर प्रतिक्षा वसुन्धरा ।

भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।

चानने मलयक सुवासित,

सौरभेँ पुष्पक प्रभावित,

करय गमगम, मुदित हर कण,

हर दिशा, हर अन्तरा

भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।

हँसि रहल निमिलित कमलदल,

मुद मनेँ अलिदलक सञ्चर,

मुदित, हर्षित, लसित कोकिल,

गाबय स्वागत अन्तरा

भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।

अर्थ निर्देश :-

१) अन्तरा = कोण / कोणा – दोगा

२) अन्तरा = दू (दिशाक) बीच मे स्थित (जगह या स्थान)

३) अन्तरा = गीतक आखर (सामान्य शब्देँ)

कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल

कामिनी !

जुनि तोड़ू अहँ फूल ।

फूलहि निर्मित अंग अहँक अछि, गरि जायत कोनो शूल ।।

मुँह अहँक जनु रक्त कमल ।

नील कमलदल नयन युगल ।

ग्रीवा मृणाल, जल अलक बनल अछि, अधर कुसुम अरहूल ।

कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल ।।

आँचरे झाँपि गुलाबक थौका ।

श्वासक संग मलय केर झोंका ।

अपनहि रमणि, रुचिर कुसुमादपि, तोड़ब किए अहँ फूल ?

कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल ।।

पद पंकज अहँ केर कोमलतर ।

उपवन बीच भ्रमर कर सञ्चर ।

अहँ केँ देखि भ्रमर लोभायल, अयलहुँ, कयलहुँ भूल ।

कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल ।।

बसन्तक आगमण पर

भेल पुलकित दिग - दिगन्त,

आ खीलि उठल हर अन्तरा

स्वागतहि आगत वसन्तक,

सजि रहल ई वसुन्धरा ।।

कास केर तजि श्वेत अभरण,

पहीरि कुसुमक ललित पहिरन,

कऽ सकल सिंगार हर्षित,

कर प्रतिक्षा वसुन्धरा ।

भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।

चानने मलयक सुवासित,

सौरभेँ पुष्पक प्रभावित,

करय गमगम, मुदित हर कण,

हर दिशा, हर अन्तरा

भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।

हँसि रहल निमिलित कमलदल,

मुद मनेँ अलिदलक सञ्चर,

मुदित, हर्षित, लसित कोकिल,

गाबय स्वागत अन्तरा

भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।

अर्थ निर्देश :-

१) अन्तरा = कोण / कोणा – दोगा

२) अन्तरा = दू (दिशाक) बीच मे स्थित (जगह या स्थान)

३) अन्तरा = गीतक आखर (सामान्य शब्देँ)

नवीन कुमार "आशा"

बेटी हमर अभिमान

अभिमान अछि बेटी
मान अछि बेटी
माता-पिताक प्राण अछि बेटी;
जॅ नहि होयत किनको बेटी
बुझि हुनक ङाढ़ गेल टुटि
अभिमान अछि बेटी।
मॉ के दुःख ओ बुझैत
हृदय सॅ कठोर नै होयति
बापक करेजक होय ओ प्राण;
बेटा सॅ बढ़ि होय अछि बेटी के ज्ञान
मान अछि बेटी
माता-पिता के प्राण अछि बेटी।
आजुक बेटी; बेटा सॅ बढ़ि के
इ सगरे दुनिया जानैत अछि
तहियो ने जानी पापी दुनिया के
बेटी जन्मक सोच सतबैत अछि;
अभिमान अछि बेटी
मान अछि बेटी।
‘‘आषा’’ के गप्प पर दियो ध्यान
अवष्य करू एकटा कन्या दान;
जॅ करब कन्या दान
तखन बाजव- ‘‘बेटी तु हमर अभिमान’’।
अभिमान ----------
मान-------------
माता-पिताक --------

(भगिनी सौम्या ‘‘गुनगुन’’ लेल)



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