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१.
डॉ॰
शशिधर कुमर
२.
नवीन कुमार "आशा"
१.

जयति जय श्री त्रिपुरारी केर
(आगामी शिवराति पर विशेष)
बम - बम भोलेनाथ, जयति - जय श्री त्रिपुरारी केर ।
त्रिलोचन, चन्द्रधारी केर ना ।।
कर मे त्रिशूल आ डमरू विराजन्हि,
जनिकर अम्बर छन्हि बघछाल ।
गरा मे लटकनि साँप अहर्निश,
संगहि रुद्राक्षक छन्हि माल ।
शम्भू – गिरिजापति, जय नीलकण्ठ, जटाधारी केर ।
गंगा मस्तकधारी केर ना ।।
श्मशान मे राज जनिक छन्हि,
भूत – प्रेत केर संग ।
कान मे कुण्डल, हाथ कमण्डल,
सौंसे देह रमओने भस्म ।
गौरीकान्त, गिरीश, उमापति, जय ऋतुध्वंशी केर ।
उगना मिथिलाविहारी केर ना ।।
वास जनिक कैलाशक ऊपर,
हिमगिरि जनिक तपोवन ।
त्रिपुरासुर केँ मारि खसाओल,
कएल जलन्धर भञ्जन ।
कार्तिक आओर गणेशक तात, रुद्र - असुरारि केर ।
बसहा बरद सवारी केर ना ।।
हिनक भक्त रावण छल रक्तप,
तइयो मान ओकर राखल ।
कयल तपस्या घोर भगीरथि,
मनवाञ्छित फल ओ पाओल।
भोला - भंगिया – शिव - शंकर; भक्तक हितकारी जे ।
विष्णु - चरण पुजारी जे ना ।।
बसन्तक आगमण पर
भेल पुलकित दिग - दिगन्त,
आ खीलि उठल हर अन्तरा१ ।
स्वागतहि आगत वसन्तक,
सजि रहल ई वसुन्धरा ।।
कास केर तजि श्वेत अभरण,
पहीरि कुसुमक ललित पहिरन,
कऽ सकल सिंगार हर्षित,
कर प्रतिक्षा वसुन्धरा ।
भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।
चानने मलयक सुवासित,
सौरभेँ पुष्पक प्रभावित,
करय गमगम, मुदित हर कण,
हर दिशा, हर अन्तरा२ ।
भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।
हँसि रहल निमिलित कमलदल,
मुद मनेँ अलिदलक सञ्चर,
मुदित, हर्षित, लसित कोकिल,
गाबय स्वागत अन्तरा३ ।
भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।
अर्थ निर्देश :-
१) अन्तरा = कोण / कोणा – दोगा
२) अन्तरा = दू (दिशाक) बीच मे स्थित (जगह या स्थान)
३) अन्तरा = गीतक आखर (सामान्य शब्देँ)
कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल
कामिनी !
जुनि तोड़ू अहँ फूल ।
फूलहि निर्मित अंग अहँक अछि, गरि जायत कोनो शूल ।।
मुँह अहँक जनु रक्त कमल ।
नील कमलदल नयन युगल ।
ग्रीवा मृणाल, जल अलक बनल अछि, अधर कुसुम अरहूल ।
कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल ।।
आँचरे झाँपि गुलाबक थौका ।
श्वासक संग मलय केर झोंका ।
अपनहि रमणि, रुचिर कुसुमादपि, तोड़ब किए अहँ फूल ?
कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल ।।
पद पंकज अहँ केर कोमलतर ।
उपवन बीच भ्रमर कर सञ्चर ।
अहँ केँ देखि भ्रमर लोभायल, अयलहुँ, कयलहुँ भूल ।
कामिनी ! जुनि तोड़ू अहँ फूल ।।
२
बसन्तक आगमण पर
भेल पुलकित दिग - दिगन्त,
आ खीलि उठल हर अन्तरा१ ।
स्वागतहि आगत वसन्तक,
सजि रहल ई वसुन्धरा ।।
कास केर तजि श्वेत अभरण,
पहीरि कुसुमक ललित पहिरन,
कऽ सकल सिंगार हर्षित,
कर प्रतिक्षा वसुन्धरा ।
भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।
चानने मलयक सुवासित,
सौरभेँ पुष्पक प्रभावित,
करय गमगम, मुदित हर कण,
हर दिशा, हर अन्तरा२ ।
भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।
हँसि रहल निमिलित कमलदल,
मुद मनेँ अलिदलक सञ्चर,
मुदित, हर्षित, लसित कोकिल,
गाबय स्वागत अन्तरा३ ।
भेल पुलकित दिग दिगन्त, आ खीलि उठल हर अन्तरा ।।
अर्थ निर्देश :-
१) अन्तरा = कोण / कोणा – दोगा
२) अन्तरा = दू (दिशाक) बीच मे स्थित (जगह या स्थान)
३) अन्तरा = गीतक आखर (सामान्य शब्देँ)
२
नवीन कुमार "आशा"
बेटी हमर अभिमान
अभिमान अछि बेटी
मान अछि बेटी
माता-पिताक प्राण अछि बेटी;
जॅ नहि होयत किनको बेटी
बुझि हुनक ङाढ़ गेल टुटि
अभिमान अछि बेटी।
मॉ के दुःख ओ बुझैत
हृदय सॅ कठोर नै होयति
बापक करेजक होय ओ प्राण;
बेटा सॅ बढ़ि होय अछि बेटी के ज्ञान
मान अछि बेटी
माता-पिता के प्राण अछि बेटी।
आजुक बेटी; बेटा सॅ बढ़ि के
इ सगरे दुनिया जानैत अछि
तहियो ने जानी पापी दुनिया के
बेटी जन्मक सोच सतबैत अछि;
अभिमान अछि बेटी
मान अछि बेटी।
‘‘आषा’’ के गप्प पर दियो ध्यान
अवष्य करू एकटा कन्या दान;
जॅ करब कन्या दान
तखन बाजव- ‘‘बेटी तु हमर अभिमान’’।
अभिमान ----------
मान-------------
माता-पिताक --------
(भगिनी सौम्या ‘‘गुनगुन’’ लेल)
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