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राजदेव मण्डलक
उपन्यास
हमर टोल
गतांशसँ आगाँ...
राति जमुन भारी सन लगै छै। खट-खट अन्हार छै।
एते लोक कतए जाइ छै हौ?
गोपी मड़रक दुआरिपर बहुते टोलबैया जमा छै। ठाढ़ भेलहा सभ गप-सप कऽ रहल छै आ बैसलाहा सभ फुसराहटि। लोकक बीचमे गोपी मड़रक जेठका बेटा मनमा बैसल छै। बैसल नै छै बल्कि अधहा सुनल आ अधहा जगल दै। जेना निशाँमे मातल हुअए। ओंघराए कऽ खसै ले करैत छै किन्तु ओकर जुआन स्त्री पाछूसँ सम्हारने छै। ओकरा स्त्रीकेँ अपना देहक कोनो सोह-सुरता नै छै। फाटल वस्त्र रहलाक कारणे ओकर छाती कनेक उघाड़ छै। सबहक नजरि पहिने ओहि उघड़ल अंगसँ टकरा जाइ छै।
आगूमे दू-तीन हाथ जगह खाली छै। जइठाम जरैत लालटेनक इजोत आ कुदैत-फानैत कीड़ा-फतिंगा। नीमक छोट-छोट ठज्ञढ़ि आ पात राखल छै।
खेलावन भगत अपना चेला-चपाटीक संगे झाड़-ॅफूंकमे लागल अछि। गरजि कऽ मंत्र जाप करैत नीमक ठाढ़िसँ बीखकेँ झाड़ि रहल अछि।
“एगारह हाथ काय चल
बरहम दोहाय चल
सातो पुरा नाग चल
हरो-हरो बिसंभरो
दोहाय बिसहारा माताक छिअ।”
गोपी मड़र अखने भुटाय वैद्यकेँ सोर पाड़ए गेलै। ओकर छोटका बेटा घनमा नीमक ठाढ़ि-डारि आ लगपाँचेक मॉंटि लाबैक लेल गेल छै।
लोग आपसी फुसराहटि कऽ रहल अछि। पाछूसँ केकरो जोरगर स्वर आएल- “की भेल छलै हौ?”
“दुनू परानी सुतल छलै। निन्न टूटलापर चिचिया कऽ कहलकै- हमरा किछु काटि लेलकौ। दौग कऽ आबैह जा।”
“हँ, सुनैत छिऐ जे परिवारमे कमाउ पुत वएह टा छै।”
“खेतपर सँ थाकल-ठेहिआएल। खेलाक बाद सुति रहलै। खाट, चौकी तँ घरमे नै छै। सिमसल जमीनपर सुतै छलै। साँप काटि लेने हेतै।”
“हँ हौ, घरक दशा नै देखैत छहक। एक दिस कूड़ा-करकटक ढेरी तँ एकदिस जंगल-झाड़। कतौ साफ-सुथरा देखै छहक। एनामे मनुख रहतै।”
“भुटाय वैद्य की कहै छै हौ?”
“कहै छै- असगुन भऽ गेलौ। सुनै छी ने नढ़िया भूकि रहल छौ। जान लेबा बेमारी छौ एकरा।”
ई सुनि मनमाक स्त्री जोर-जोरसँ कानय लगली।
“फटृट चुप, कुलछनी। बाप-बाप चिचिया रहल छेँ। सतबरती रहितें तँ एना हेबे नै करितौ।”
गोपी मड़रकेँ ठोर सुखि गेल छै। आँखिमे लोर नै छै तैयो गमछासँ पोछि रहल अछि। मनमाक स्त्री ठोह पाड़ि कऽ कानि रहल छै। गोपी मड़रक छोटका बेटा घनमाकेँ आब दुख बरदाइशसँ बाहर भऽ रहल छै। ओ चिचिया कऽ कहै छै- “हौ भैयाकेँ कहुना बचा दहक हौ सर-समाज।”
मनमाक हालति निरन्तर बेसी खराब भेल जा रहल छै। आब ऊ घररए लगलै।
“नै बचतै शाइत आब।”
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