Writings
श्री योगेश्वरजीनी कलम ए गुजराती साहित्यनी शकवर्ती घटना छे. युवानीना दिवसोथी ज सातत्यपूर्ण रीते मा सरस्वतीनी आराधना करती एमनी लेखिनीए लगभग पांच दायकानी साहित्ययात्रा दरम्यान गुजराती जनताने घणुं घणुं धरी दीधुं. गुजराती आध्यात्मिक साहित्यना सीमाचिन्ह समी एमनी आत्मकथा 'प्रकाशना पंथे' थी मांडीने एमना द्वारा प्रसादित जीवनकथा, अनुवादो, महाकाव्यो, कविताओ, लेखो, नवलकथाओ अने बेनमून चिंतनग्रंथो वडे गुजराती साहित्य समृद्ध बन्युं.
अहीं प्रस्तुत बहुधा कृतिओनो रचनाकाळ १९४० थी १९५५ वच्चेनो छे, ज्यारे तेओ हिमालयना शांत एकांत प्रदेशमां इश्वरनी शोधमां जीवन निर्गमन करता हता. साहित्यसाधना एमने माटे बाधक बनवाने बदले एमनी जीवनसाधनानी संगिनी बनी. ए काळ दरम्यान एमनी मानसगंगोत्रीमांथी जे जे अवतीर्ण थयुं ते बधुं कलमना माध्यम द्वारा प्रस्फुटित थयुं अने समय आव्ये ग्रंथो द्वारा जनहितार्थे प्रस्तुत थयुं. नात, जात, संप्रदाय के धर्मना वाडाओ जेमने स्पर्शी नहोता शक्या एवा आ महापुरुषे श्वेतवस्त्रने शोभावी संतपणाने तो अनोखी गरिमा बक्षी ज किन्तु साथे साथे कलमने पण गौरव प्रदान कर्युं. प्रसिद्धि के प्रशस्तिनी परवा कर्या वगर साचा कर्मयोगीनी पेठे जीवनना अंत सुधी गुजराती साहित्यनी मूक सेवा करतां रही तेओ १९८४मां चाली निकळ्या. गुजराती जनता अने साहित्यकारोए हजी एमना साहित्यीक वारसाने यथार्थ रीते पिछानवानो अने पूर्ण मात्रामां मुलववानो बाकी छे.
'परिमल', 'सनातन संगीत', 'अनंत सूर' तथा 'अक्षत' योगेश्वरजीना अन्य सर्जनो करतां निराळी भात पाडे छे. एमां आलेखीत अपद्यागद्य रचनाओ एमना मनोभावोनुं दर्पण बनी एमना विशाळ व्यक्तित्वनुं अनोखुं उदघाटन करे छे. ए मधुमय रचनाओमां टागोरनी 'गीतांजली' के अंग्रेज कवि शेली अने वर्डझवर्थना लखाणो जेवी विचारोनी ताजगी, भावोनी उदात्तता अने अभिव्यक्तिनी मोकळाश महेंके छे.
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प्रभातना पुष्पोनी महेंकथी महेकती आ अर्थसभर रचनाओनो गुजराती साहित्यरसिको भ्रमर बनी आस्वाद लेशे तो एमनो श्रम सार्थक लेखाशे. योगेश्वरजीनी कमनीय कलमनी भावप्रचूर अभिव्यक्ति विशे तमारा प्रतिभावोनो अमने इंतजार रहेशे.
