Chapter 04
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Bhagavad Gita - Chapter 04 : Sanskrit
Karma-brahmarpan Yog
In this chapter, Krishna describes the reason for his time-to-time descent on this earth. In order to protect his devotees and to eradicate evils, God periodically manifest on this planet. The chapter also details on action (karma), non-action (akarma) and performance of rituals (yagna). Lord Krishna also highlights the path of knowledge (Gnān) for ultimate salvation.
अध्याय चोथो : कर्मब्रह्मार्पण योग
भगवान चोथा अध्यायमां रहस्योदधाटन करतां कहे छे के परापूर्वथी आ ज्ञान चाल्युं आवे छे. में (भगवाने) विवस्वानने, विवस्वाने मनुने अने मनुए इक्ष्वाकुने आ ज्ञान आप्युं हतुं. आ सांभळी अर्जुनने वळी शंका थइ के विवस्वान तो घणां समय पूर्वे थइ गया अने भगवान तो हजु शरीरधारी तेनी सामे उभेला छे. आवुं केवी रीते शक्य बने ?
आ प्रश्नना जवाबमां भगवान पोताना अवतारोनुं रहस्योदघाटन करे छे. भगवान कहे छे के हे अर्जुन, मारा अने तारा अनेक जन्मो जइ चुक्या छे. फरक एटलो ज छे के मने ते बधा याद छे ज्यारे तने तेनी विस्मृति थइ छे. ज्यारे ज्यारे धर्मनो नाश थइ जाय छे त्यारे धर्मनी संस्थापना माटे हुं प्रगट थाउं छुं. हुं दुष्टोनो संहार करुं छे अने मारा भक्तोनुं रक्षण अने पालन करुं छे.
भगवान कर्म अने अकर्म विशे प्रकाश पाडतां जणावे छे के फळनी तृष्णा त्यागीने थयेल कर्मो बांधता नथी, ए कर्म करनार, ए कर्म करवा छतां एनो कर्ता थतो नथी. भगवान जुदी जुदी जातना यज्ञ विशे पण प्रकाश पाडे छे अने जणावे छे के द्रव्य वडे थतां यज्ञो करतां ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ छे.
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