थोडा दिवसो पहेला ज वसंतपंचमीना दिवसे ऊर्मिनी आ गझल आप सौए - ऊर्मिनो सागर - पर तो माणी ज हशे. आजे अहीं आ गागरमां पण ए अडबंग ऊर्मिओ छलकावी ज दइए..!! अने हा, साथे माणीए जुगलकाकाए करावेलो एवो ज मझानो आस्वाद..!!

(तारी मारी वच्चे आ उन्माद जेवुं… फोटो: ऊर्मि)
इच्छानुं तो एवुं छे भै, घास जेवुं…
ऊगी आवे ज्यां मळे भीनाश जेवुं.
तारी मारी वच्चे आ उन्माद जेवुं…
कैंक तो छे ढाइ अक्षर पाश जेवुं !
मारी अंदर रहुं छुं हुं हज्जार रूपे…
तोय मने हुं क्यां मळुं जराक जेवुं !
सूरज समजणनो पछी देखाय शाने ?
होय मन ज्यां गोरंभायेल आभ जेवुं !
तुं जो नहीं आवे सखा, तो चालशे,
मोकल मबलख मघमघ थोडी याद जेवुं.
आटला वर्षे समजायुं ‘ऊर्मि’ने आ,
साव अडबंग होय छे आ व्हाल जेवुं !
- ऊर्मि (५ ऑगष्ट २०१२)
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अने हवे माणीए जुगलकाका ( श्री जुगलकिशोर व्यास) द्वारा आ गझलनो एवो ज मझानो आस्वाद!
‘ऊर्मि’ नामथी ओळखाती ने ‘ऊर्मिनो सागर’ नामक साईट छलकावती आ कवयित्री लांबा समयथी ब्लॉगजगतनी सर्जनात्मकशक्तिरूपा छे अने विदेशोमां ऊजवाता रहेता अनेक प्रसंगोमां सहयोगी भूमिका भजवती एवी व्यक्तिविशेषरूपा छे. पोताना ब्लॉग पर एमणे अनेक प्रयोगो कर्या छे. सहियारा सर्जननो एमनो प्रयोग ब्लॉगजगतमां एक मजानो प्रयोग बनी रह्यो छे….एमनी रचनाओमां एमना तखल्लुस ऊर्मिनुं विशेष प्राधान्य होय छे.
अहीं प्रस्तुत एमनी रचनामां ऊर्मितत्त्वनां केटलांक रूपो एटलां सूक्ष्म छे के कवयित्री पण एने स्पष्ट नाम नथी आपी शकतां – ने एटले समग्र गझलमां कहेतां रह्यां छे के ए कशुंक “एना जेवुं” छे. मनना विविध भावो आ आखी रचनाने सळंग एक विचार पर पकडी राखे छे.
शरूआत तेओ इच्छा नामक एक एवा तत्वथी करे छे जेने अध्यात्ममां बहु वगोववामां आव्युं छे. पण नर्या जीवनमां तो ते तत्त्व एवुं सहज छे के सहेज अमथी भीनाश हैये देखाई नथी के ते – घासनी जेम – ऊगी नीकळी नथी !
मजानी वात तो ए छे के, प्रेमतत्त्वने इच्छानी पछी तरत ज मूकीने एमणे ढाई अक्षरी तत्त्वनो पाश उन्माद कहीने सरस रीते समजावी दीधो छे. एय ते वळी एटले सुधी के उन्मादमां फसायेलुं व्यक्तित्व पोताने माटे पण समय काढी शकतुं नथी ! पोतानी भीतरमां हज्जारो रूप धरीने रहेतुं व्यक्तित्व पण भावजगतनी विविध लीलाओ वच्चे एटलुं बधुं व्यस्त–मस्त होय छे के खुदने पण जो मळे तोय फक्त ‘जराक जेवुं’ ज मळी शके छे !
हवे जो परिस्थिति आवी होय तो कारण पण जाणवुं रह्युं. कवयित्री ते शोधी काढे छे : एमने ‘समजाय’ छे के, मन जो (आवा भातभातना भावो थकी) आकाशी गोरंभथी ग्रस्त होय तो सूर्य जेवो सूर्य पण देखी शकातो नथी. एटले कहेवानुं तो ए पण थयुं ने के, प्रेम आंधळो नथी….तकलीफ जे कांई थाय छे प्रेममां, ते तो थाय छे आ अनेक भावोना गोरंभने लीधे !!
जोके प्रेमतत्त्वनुं एक सुख होय छे. एमां आडशे छुपायेली वासना जो भळेली ना होय तो ए बहु संतुष्टतत्त्व छे. सखो सदेहे ज सामे आवीने ऊभो रहे एवी स्थूळतानुं ए लालची नथी. प्रेमतत्त्व तो लगरीक याद जेवी झरमर थकीय तुष्टतुष्ट बनी रहे छे.
भावोमां रममाण व्यक्तित्व जीवनना भावुक अने व्यावहारिक एवा बन्ने प्रकारना अनुभवोमांथी जोके क्यारेक समजण पण मेळवे छे, आ बधा भावो अंगे भले स्पष्टरूपे नहीं तोय कशोक सार ते काढे छे. एने वारंवारना बदलाता रहेता भावानुभवोने अंते ‘समजाय’ छे के आ बधा अवारनवार ने आडेधड आवी चडता भावो के जेने पोते चाहती रही छे, व्हाल करती रही छे ते साव अडबंग ज होय छे बलके ए व्हाल ज खुद अडबंग छे !!
अहीं मीरांने लगरीक याद करवी पडे ! एणे गायुं छे ने के, “मैं जो ऐसा जानती….(तो) नगर ढिंढोरा पीटती, (के) प्रित न कीजो कोई !” भले, मीरांनी समजण ने ऊर्मिनी समजणमां “समजण फेर” जुदो ने झाझो छे पण ते छतां अहीं बेउने भेगी करी देवानुं साव अप्रस्तुत तो न ज गणाय !
एक नानकडी शब्दयोजना तरफ ध्यान दोरवा जेवुं लागे छे. सखाने थोडी…क याद जेवुं मोकलवानुं कहेती कवयित्री पाछी बे मोटां विशेषणोय सखाने सोंपीने मूंझवी मारे छे ! एक छे घ्राण विषयक विशेषण ‘मघमघ’ अने बीजुं जथ्थावाचक विशेषण ‘मबलक’ !! सखो बीचारो आवडुं मोटुं पार्सल ‘लगरीक’ यादना नाम–सरनामे–बहाने शी रीते मोकली शकशे, ऊर्मिबहेनां ?!