पण्डित रामलोचन जी उस जमाने (सन 1973-74) में, जब श्रीमोहन इण्टर के छात्र थे, अपनी साइकल पर उनके कालेज में यदा कदा चले आते थे। कभी किसी कक्षा में और कभी किसी लैब में। हर छात्र रुपया अठन्नी उनकी झोली में डाल देते थे। सब में उत्साह था - मन्दिर बनना प्रारम्भ हो गया था और हर छात्र जल्दी से मन्दिर बना देखना चाहता था!पण्डित रामलोचन ब्रह्मचारी जी को भग्वद-प्रेरणा मिली सन 1937 में। सन 1957 से उन्होने चन्दा इकठ्ठा करना प्रारम्भ किया। और अब जब मन्दिर परिसर पूर्ण बन गया है, तब वहां हनुमान जी का मन्दिर, शिवालय, संग्रहालय, पुस्तकालय, योगालय, जिम्नैजियम और आयुर्वेदिक तथा होमियोपैथिक औषधालय हैं।
ताड़/नारियल के पत्तों के दोनों का ढ़ेर | मिठाई रखा दोना, ऊपर पत्ते का ढ़क्कन |
मुझे यह पुराना ब्लॉग इसकी टेम्पलेट की सुविधा के लिये प्रिय है, पर इसमें टिप्पणी व्यवस्था बेकार है।लिहाजा मै डिस्कस का एड-ऑन जोड़ कर इसी ब्लॉग पर पोस्ट कर रहा हूं - देखता हूं, मित्रगण आते हैं या नहीं!
डिस्कस की टिप्पणी व्यवस्था का प्रयोग मैँ पहले भी कर चुका हूं -लगभग साल भर पहले और इस साइट का कहना है कि अब यह पहले से बेहतर है! देखिये!
अमवसा[1] का स्नान था दो फरवरी को। माघ-मेला क्षेत्र (संगम, प्रयाग) में तो शाही स्नान का दिन था। बहुत भीड़ रही होगी। मैं तो गंगाजी देखने अपने घर के पास शिवकुटी घाट पर ही गया। सवेरे छ बज गये थे जब घर से निकला; पर नदी किनारे कोहरा बहुत था। रेत में चलते हुये कभी कभी तो लग रहा था कि अगर आंख पर पट्टी बांध कर कोई एक चकरघिन्नी घुमा दे तो आंख खोलने पर नदी किस दिशा में है और मन्दिर/सीढ़ियां किस तरफ, यह अन्दाज ही न लगे। नया आदमी तो रास्ता ही भुला जाये!
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[1] अमवसा का स्नान - माघ महीने में संगम पर कल्पवास करते श्रद्धालु आमावस्या के सवेरे मुख्य स्नान करते हैं। स्थानीय भाषा में इसे अमवसा का स्नान कहा जाता है। संगम पर अमवसा का मेला लगता है। बहुत भीड़ जुटती है!
पूरी पोस्ट मेरे वर्डप्रेस वाले ब्लॉग "मेरी मानसिक हलचल" पर पढ़ें:
अमवसा स्नान, कोहरा और पारुल जायसवाल
पॉण्टून का पुल है गंगाजी पर सिरसा से सैदाबाद की तरफ गंगापार जाने के लिये। चौपहिया गाड़ी के लिये पच्चीस रुपये लगते हैं। रसीद भी काटता है मांगने पर। न मांगो तो पैसा उसकी जेब में चला जाता है। एक दो लाल तिकोनी धर्म ध्वजाये हैं। आसपास के किसी मन्दिर से कुछ श्लोक सुनाई पड़ रहे थे। गंगाजी की भव्यता और श्लोक - सब मिलकर भक्ति भाव जगा रहे थे मन में।
तारकेश्वर बब्बा ने बता दिया था कि गाड़ी धीरे धीरे चले और लोहे के पटिय़ों से नीचे न खिसके। वर्ना रेत में फंस जाने पर चक्का वहीं घुर्र-घुर्र करने लगेगा और गाड़ी रेत से निकालना मुश्किल होगा। ड्राइवर साहब को यह हिदायत सहेज दी गयी थी। धीरे चलने का एक और नफा था कि गंगाजी की छटा आखों को पीने का पर्याप्त समय मिल रहा था।
इस पूरी पोस्ट को मेरे वर्डप्रेस वाले ब्लॉग मेरी मानसिक हलचल पर पढ़ें:
अब यह बेक्टीरिया रेलवे प्रयोग कर रहा है अपने ट्रेनों के टॉयलेट्स में। ट्रायल के तौर पर बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस के 23 कोच इसके प्रयोग के लिये तैयार हैं और 17 जनवरी से चल भी रहे हैं।
आत्म-कथ्य - मैं रेलवे के लिये प्रेस विज्ञप्ति ठेलक नहीं हूं और उत्तर-मध्य रेलवे के लिये यह ब्लॉग सूचना डिसिमेनेशन (dissemination - प्रसारण) का माध्यम भी नहीं है। पर रोज के काम में जब मुझे यह बायोडाइजेस्टर टॉयलेट की जानकारी मिली, तो लगा कि यह सब के लिये रोचक और मेरे सरकारी दायित्व के सन्दर्भ में कण्टकहीन विषय है जिस पर लिख सकता हूं ब्लॉग पर।
पूरी पोस्ट आप पढ़ें मेरी मानसिक हलचल पर:
बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस और बायोडाइजेस्टर टॉयलेट
अरविन्द पौधे के पास फावड़े से रेत खोद रहा था। उसमें गोबर की खाद मेरे सामने ही बिछाई। बोला - इसपर एक गिलास यूरिया डाल कर समतल कर देंगे और उसके बाद बस सिंचाई ही करनी है।
पहले वह मुझसे कहता था - क्या करें बाबूजी, यही काम है। पर अब वह मुझसे परिचय होने पर खुल गया था और बेहतर आत्मविश्वास में लगा - इस काम में मजूर भी लगा दें तो आधा-तीहा काम करेंगे। पता भी न चलेगा कि खाद पूरी डाली या नहीं। अब खुद के पास समय है तो मेहनत करने में क्या जाता है?
[पूरी पोस्ट वर्डप्रेस वाले ब्लॉग पर यहां पढ़ें।
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इस दान से कोई सिने स्टार, कोई राजनेता, कोई धर्माचार्य सहज जुड़ सकता है। इस मुद्दे की बहुत इमोशनल वैल्यू है। कोई भी अपनी छपास दूर कर सकता है किसी बड़े दिन कम्बल-कटोरी दान कर। अगर आप नेकी कर दरिया में डालने वाले हैं तो फिर कोई कहने की बात ही नहीं!
पर क्यों हो दान की एक्यूट आवश्यकता? क्यों न हो समाज का उत्थान? क्यों रहें मुसहर, मुसहर? क्यों न हो विकास? इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलेपमेण्ट की योजनायें क्यों शिलिर शिलिर चलें और शोशेबाजी वाली स्कीमों के बल पर सरकारें बन जायें - स्कैम करने के लिये?
बड़े सवाल हैं जो लोकोपकार जैसी आत्मतुष्टि की भावना से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं! (वैसे भी आप बबन पाण्डेय की बात मानें तो फिलेंथ्रॉपी करते आप बिहार में कम्बल बांटते बांटते थक जायेंगे!)
मेरे परिवेश में, इलाहाबाद के समीप, तीन मेगा थर्मल पावर स्टेशन आने वाले हैं - करछना, मेजा और शंकरगढ़ (बारां) में। प्रत्येक की क्षमता दो हजार मेगावाट की होगी। इनके आने से इस क्षेत्र का विकास जरूर होगा। पर्यावरणीय पांय-पांय होगी; पर गरीबी रहे तो पर्यावरण ले कर क्या करें? चाटें?
इसी तरह गंगा/यमुना एक्प्रेस हाईवे की योजनायें हैं। देखें कब पूरी होती हैं। उनके आने से बहुत कुछ बदलेगा परिदृश्य। जमीन अधिग्रहण जरूर एक कठिन मुद्दा है; पर सरकार-कॉर्पोरेट सेक्टर और किसान की ईमानदारी से वह भी सलट सकता है। ईमानदारी? थोड़ी रेयर कमॉडिटी है जरूर!
इनके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक सुविधायें और श्रम आदि के क्षेत्र की दशा देख तो मन बुझ जाता है। बहुत कुछ करना है वहां।
लोकोपकार से कहीं ज्यादा इन योजनाओं की बाधायें दूर करना, उनके लाल-फीते हटाना जरूरी है। उसके लिये कहीं ज्यादा सामाजिक जागरूकता और व्यक्तिगत-सामाजिक-सरकारी एक्टिविज्म की दरकार है।
आज के शापित-स्कैमित1 वर्तमान से उस भविष्य की ओर चलना है। उसके लिये हम अपना योगदान करें; लोकोपकार के दान के साथ साथ!
1. स्कैमित - embroiled in scam.
हममें से हर एक दान देता है। सब से आसान है रेलवे स्टेशन या हनुमान मन्दिर पर उपलब्ध भिखारी को दान देना। पर वह देते समय मन में यह भाव होता है कि एक आदमी को अकर्मण्य बनाने में हम योगदान कर रहे हैँ। अत: इन भिखारियों को अनदेखा करने की भावना भी मन में स्थाई रूप से आती गयी है। फिर भी इन भिखारियों की बड़ी संख्या को देखते हुये लगता है कि यह फिलेंथ्रॉपी (philanthropy - लोकोपकार) का तरीका बहुत लोकप्रिय है।
शायद यह फिलेंथ्रॉपिक इनवेस्टमेण्ट (पी.आई.) का सबसे सुगम तरीका है। जैसे पी.आई. का म्यूचुअल फण्ड हो! पर मेरे ख्याल से इस इनवेस्टमेण्ट का रिटर्न बहुत कम है। सीधे पी.आई. की इक्विटी में निवेश करना चाहिये।
पी.आई. का रिटर्न इस तरह से मापना चाहिये कि उससे कितने की जान बची, कितने को आपने साक्षर बनाया, कितने को आंखों की ज्योति दी, कितने लोगों को आपने अपने परिवेश के प्रति जागरूक बनाया, आदि...
इस बार मैने कुछ ग्रामीण मुसहरों को कम्बल देने का निर्णय किया। मेरी पत्नीजी का विचार था कि मुसहरों को नहीं, उनकी स्त्रियों को दिये जाने चाहियें ये कम्बल। अन्यथा मुसहर तो तुरंत बेच कर पैसे की दारू पी जायेगा। बहुत सही विचार था। पर क्रिया रूप देना सरल काम नहीं था।एक तरीका तो यह था कि किसी एनजीओ को तलाश कर उसे पैसे दे दिये जायें। इसमें आपको एनजीओ पर विश्वास होना चाहिये। पर गुजरात भूकम्प के दौरान कई फर्जी एनजीओ देखने के बाद उनपर यकीन नहीं होता है। दूसरे यह भावना होती है कि जब आसपास इतने जरूरतमन्द हैं तो एनजीओ तक जाने की क्या जरूरत?!
अत: हमने दूसरा तरीका अपनाया। कटरा जा कर कम्बल खरीदे। फिर हमने अपने साले साहब से फोन पर अनुरोध किया कि वे इन्हे मुसहरों में बंटवा दें। उनका उत्तर था कि उनके गांव से मुसहर पलायन कर गये हैं। और अन्य उतने ही जरूरत मन्द को अगर वें देंगे भी तो (उनके राजनैतिक जीव होने के कारण) लोग यह तोहमद लगायेंगे कि ग्रामविकास का पैसा अपने नाम से बांट कर वे धांधली कर रहे हैं!
भगवान की कृपा से मेरे दूसरे साले जी की पत्नीजी (श्रीमती आराधना दुबे1) ने यह कार्य सम्पन्न कर दिया। वे बनारस के पास एक ग्रामीण प्राइमरी स्कूल की प्रधानाध्यापिका हैं। स्कूल के पास ही नट रहते हैं। अत्यंत विपन्न। उनके लिये वे स्वयं भी पुराने ऊनी कपड़े आदि ले जा कर देती रहती हैं। बहुत आभारी हुये हम उनके।
हमारे पी.आई. का रिटर्न? मेरे ख्याल से बहुत अधिक! चार-पांच साल पहले एक छोटी सी खबर पढ़ी थी कि हमारे ससुराल के गाँव का एक मुसहर सर्दी से मर गया था। ये कम्बल एक भी जिन्दगी बचाते हैं या एक भी नट को बीमार होने से बचाते हैं तो हमारा लाभ बहुत बहुत अधिक हुआ।
1. आराधना दुबे ने यह सहायता की। एक दूसरी आराधना की ब्लॉग पोस्ट पढ़ते समय यह कम्बल देने का विचार आया था! दोनो आराधनाओं को बहुत धन्यवाद।
शिवकुमार मिश्र, दुर्योधन की डायरी के पच्चीस-छब्बीस पन्ने छाप चुके हैं। दुर्योधन ने अब तक इस पर एतराज नहीं किया, सो मान सकते हैं कि उनकी सहमति है। अन्यथा यह सहस्त्राब्दियों का सबसे बड़ा लीक होता!
यह बहुत लोकप्रिय लीक क्यों है? सभी कलाकार राजनेताओं के लिये दुर्योधन से बड़ा आइकॉन कौन हो सकता है? रावण में वह पोलिटिकल चातुर्य नहीं दीखता। बर्बरता दीखती है – सीतामाता के साथ अन्याय करते हुये। दुर्योधन का सोफिस्टिकेटेड काइंयापन कहां मिलेगा!
शिवकुमार मिश्र के पास जबरदस्त दस्तावेज हैं और वे सारे के सारे लीक नहीं कर रहे हैं। पता नहीं जन दबाव क्यों नहीं पड़ता कि वे सारे के सारे एक साथ लीक कर दें।
मैं वही दबाव डालना चाहता हूं।
आप चर्चा करें, पर आप एक वाद की तरफदारी करें तो हम जैसे क्या टिपेरें? एक सज्जन नृशंस माओवादी नक्सली हत्यारों के समर्थक/सहायक हैं। एक कोर्ट उन्हे दण्डित करती है तो बहुत पांय पांय मचती है। वैसे भी आजकल समझ का उलटफेर चल रहा है। हम जिसे गद्दार समझते हैं, वह बुद्धिजीवियों की समझ में महान देश भक्त या मानवता भक्त निकलता है। जिसे बुद्धिवादी महान समाजवादी समझते हैं, वह वह देश बेच-खाने वाला निकलता है। जिसे राजनेता समझते हैं वह … लिहाजा बिनायक सेन के मामले में हम जजमेण्टल कैसे बनें? कुछ हिन्दूवादी थामे गये हैं, उनके बारे में भी जजमेण्टल नहीं हैं।
पर यह देखते आये हैं कि यह नक्सलवाद कोई क्रान्ति फ्रान्ति करने वाला नहीं। शुद्ध माफिया है। रंगदारी वसूलक। तरह तरह के असुर इससे जुड़े हैं। कुछ सिद्धान्तवादी भी शायद होंगे। पर वे चीन के इशारे पर तीस साल से खुरपेंच कर रहे हैं। वे अदरवाइज रिकेटी डेमोक्रेसी का रक्त निकाल रहे हैं। साथ साथ जनता का भी। और इनसे आदिवासी का चवन्नी अठन्नी भर भी कल्याण हुआ हो, लगता नहीं।
यह हिन्दी ब्लॉगजगत जितना बुद्धि का दर्शायक है; उतना भावना का भी। जनता का बहुत बडा वर्ग नक्सल आतंक से तंग आ चुका है। पोलीस अगर लड़ रही है नक्सल से तो वह पोलीस के साथ है। और बुद्धि का एलीट अगर उस जनता से तरस खाने की मुद्रा अख्तियार करता है तो बुद्धि पर तरस आता है।
मैं इस बात में नहीं जाता कि बिनायक सेन किस हद तक नक्सली के साथ हैं और किस हद तक सरकारी जुल्मों का विरोध करते हुये नक्सली जुल्मों का भी विरोध करते हैं। पर ऐसे मामले में जिस तरह के लोग टर्राने लगते हैं, वे ही अब टर्रा रहे हैं। और उनका लिखा पढ कर रियेक्ट करने का मन नहीं होता।
ऐसे में चिठ्ठाचर्चा की एकतर्फियत जमी नहीं! अगले जनम में भगवान इण्टेलेक्चुअल बनायें तो शायद बात कुछ और हो। फिलहाल तो जो है सो है।
अगर ब्लॉगजगत में मात्र रचनाधर्मिता की चर्चा होती है, तो चर्चाकार अपनी पसन्द की कविता/कहानी/पोस्ट की चर्चा करें तो ठीक। पर अगर एक विवादास्पद मुद्दे की चर्चा हो तो एक तरफा विवरण चर्चामंच का मिसयूज है, एक वाद की तरफदारी फैलाने के लिये। यह हो सकता है कि चर्चाकार अपनी पसन्द से ६०:४० या ७०:३० का अनुपात बना सकते हैं। पर एक तरफा बात करना चारित्रिक दोष है ऐसे मंच का।
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| फॉर्ब्स इण्डिया में श्री विनोद राय पर एक पन्ना |
अरविन्द से मैं सन 2009 के प्रारम्भ में मिला था। गंगा किनारे खेती करते पाया था उसे। तब वह हर बात को पूरा कर वह सम्पुट की तरह बोल रहा था - “और क्या करें, बाबूजी, यही काम है”।
कल वह पुन: दिखा। वहीं। रेत में खेती करता। आसपास मुझ जैसे दो तीन तमाशबीन थे। कोंहड़ा की कतारें बड़ी हो गयी थीं। वह कोंहड़ा के आस पास तीन गढ्ढ़े खोद रहा था - करीब दो हाथ गहराई वाले। उनमें वह गोबर की खाद डालकर कुछ यूरिया डालेगा। कोंहड़े की जड़ इतनी नीचे तक जायेगी। वहां तक उनको पोषक तत्व देगी खाद।
खोदते हुये वह कहता भी जा रहा था - "क्या करें, यही काम है।"
बोल रहा था कि पिछली खेती में नफा नहीं हुआ। उसके पहले की में (जिसकी पहले वाली पोस्ट है) ठीक ठाक कमाई हो गई थी। "अबकी देखें क्या होता है?"
व्यथित होना अरविन्द के पर्सोना का स्थाई भाव है। कह रहा था कि गंगा बहुत पीछे चली गई हैं; सो खोदना फावड़े से नहीं बन पा रहा। वह यह नहीं कह रहा था कि गंगा इतना पीछे चली गई हैं कि खेती को बहुत जगह मिल गई है!
"जिससे खोद रहे हो, वह क्या है?"
"रम्बा कहते हैं।" इस उपकरण को तीन-चार बार रेत में ठोंक कर बाहर रेत निकालता था। "हम लोग फावड़े से ही काम करते हैं। रम्बा से काम करना अटपटा है।"
बढ़िया लगा उपकरण मुझे। उसका वीडियो आप देखें।
अरविन्द का कहना है कि एक कुम्हड़े के पौधे से पच्चीस-तीस फल मिलेंगे। उसके लिये तीन गढ्ढ़े खोदना; फिर खाद/यूरिया डालना और तब सिंचाई/रखवाली! मेहनत की रिटर्न कैसी है? मेरे ख्याल से बहुत कम। उसपर अगर रेट कम रहे तो जय राम जी की! शायद और विकल्प होता तो अरविन्द यह काम नहीं करता। पर मैं गलत भी हो सकता हूं - कई बार होता रहा हूं। ![]()
‘‘पीपली लाइव‘‘ फिल्म देखी । फिल्म की विशेषता भारतीय गांव का सजीव व यथार्थ चित्रण है ,जिसमे किसानों की कर्ज में डूबने के बाद आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति की पृष्ठ भूमि में कूकरमुत्तों की तरह फैले खबरी न्यूज चैनलों तथा देश की राजनीति पर करारे व्यंग किये गये हैं।
फिल्म की चुस्त पट्कथा और छायांकन की ऊघेड़बुन के बीच एक खामोश पात्र दिखाई दिया - होरी। परिधान सज्जा के नाम पर गांधीवादी लंगोट धारण किये गये हुए वह हाड़-मांस का पिंड पूरी तल्लीनता व निर्विकार भाव से एक गड्ढा खोदता रहता है । गड्ढे के उत्खनन से निकली मिट्टी ही कर्ज में डूबे उसके परिवार की आजीविका का एक मात्र साधन है। इस भगीरथ प्रयत्न से उसके ऋण की एक भी पाई तो क्या कम हुई होगी, लेकिन शायद उसकी आत्मा में निहत परम तत्व ने ही करुणावश एक दिन होरी की कर्मभूमि गड्ढे में ही उसे संसार के प्रत्येक ऋण से उऋण कर दिया।
फिल्म में तो होरी की इस पूर्णाहुति को "खबरी" चैनलों व देश के कर्णधार नेताओं की संवेदना न मिल सकी किन्तु क्या दर्शक भी इस पात्र को उतनी ही सरलता से भूल सकते है?
वास्तव मे, 21वीं सदी की फिल्म के इस मूक पात्र को देखकर सहसा ही 19 वीं सदी की पृष्ठभूमि में लिखे गये प्रेमचन्द साहित्य के पात्र मानस पटल पर मानो जीवन्त हो उठते है। सदियों का यह अन्तर होरी के मूक अस्तिव मे जाकर खत्म होने लगता है। क्या यह होरी विक्रम वेताल की कहानियों का शापित वेताल है जो हर युग और हर सदी में भारतीय किसान की पीठ पर टंगा रहता है? या यह इस देश का एक शाश्वत सत्य है जो परिवर्तन जैसे प्राकृतिक नियम को भी ठेंगा दिखाकर आज भी अपने मूलरूप मे विद्यमान है!
विचारों के इस झंझावात के बीच एक प्रश्न उठता है कि क्या आने वाली पीढ़ी भी होरी के इस शाश्वत स्वरूप का ही साक्षात्कार करेगी और इससे भी महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या यह हाईटेक पीढ़ी होरी की व्यथा को समझ पायेगी? इस प्रश्न का समाधान वर्तमान पीढ़ी के तथाकथित् बुद्धिजीवी वर्ग को ही खोजना होगा।
ज्ञानदत्त पाण्डेय उवाच:
1. मैने फिल्म नहीं देखी है। अत: मेरा उवाच निरर्थक भी कहा जा सकता है।
2. अनुषा रिजवी (फिल्म की निर्देशक) ने कहा है कि होरी महतो नामक चरित्र फिल्म में मुंशी प्रेमचन्द को श्रद्धांजलि स्वरूप है। यह बताने के लिये होरी महतो फिल्म में है कि प्रेमचन्द से अब तक के समय में किसान की हालत नहीं बदली है।
3. यह तो सत्य है कि भारत एक दो शती में नहीं, दो सौ सदियों में एक साथ जीता है। और अगले कुछ दशकों में नरेगा/मनरेगा के बावजूद जियेगा ही होरी। उस गरीब को चूसने के लिये संतरी से ले कर मंतरी तक सभी रहेंगे। और उसकी हालत बयान करने को स्यूडो-इण्टेलेक्चुअल नहीं, सही मायने में संवेदन शील लोग भी रहेंगे! आप अपने बच्चों को वह सेंसिटिविटी देंगे न? मैं तो नत्तू पांड़े को वह संवेदना जरूर दूंगा!
नत्तू पांड़े आजकल ननिहाल आये हुये हैं। अब डेढ़ साल के हुये हैं तो कारकुन्नी भी उसी स्तर के हैं। कुछ ज्यादा ही। उनकी नानी मगन भी हैं और परेशान भी रहती हैं। अजब कॉम्बिनेशन है उनकी खुशी और उनकी व्यग्रता का।
उनको भोजन करना एक प्रॉजेक्ट होता है। एक छोटी सी थाली, जिसमें कटोरी एम्बेडेड है; में उनका खाना निकलता है और उसके साथ होने लगते हैं उनके नखरे – न खाने की मुद्रायें दिखाने वाले। तब घर के सारे लोग उन्हे भोजन कराने में जुट जाते हैं। कोई ताली बजाता है। कोई मुन्नी बदनाम सुनाने लगता है तो कोई जो भी श्लोक याद है, उसका पाठ करने लगता है। यह सिर्फ इस लिये कि नत्तू पांडे का ध्यान बंटे और उनके मुंह में एक कौर और डाल दिया जाये।
मोटी-मांऊ नाट्य तीन अंकों का है। पहले चरण में घर की डोर-बेल कोई बजाता है और नत्तू को बताया जाता है कि मोटी मांऊ आ गई है। जोर से चिल्ला कर कहा जाता है – नहीं आना मोटी-मांऊ, राजा बेटा खा रहा है खाना। एक दो कौर धकेले जाते हैं नत्तू के मुंह के अन्दर। अगले चरण में मोटी-मांऊ के रूप में कोई डाइनिंग रूम का दरवाजा पीटता है। फिर जोर से चिल्ला कर कहा जाता है – नहीं आना मोटी-मांऊ, राजा बेटा खा रहा है खाना। इससे एक दो कौर और धकेले जाते हैं। तीसरे चरण में मोटी मांऊ फोन करती है। स्पीकर फोन में गड़गड़ाती आवाज में बोलती है – मैं मोटी-मांऊ बोल रही हूं। राजा बेटा खाना खा रहा है कि मैं आऊं? फिर जोर से चिल्ला कर कहा जाता है – नहीं आना, नहीं आना मोटी-मांऊ, राजा बेटा खा रहा है खाना।
नतू पांड़े का भय बढ़ जाता है। और कम हो जाता है भोजन का कौर स्वीकारने का अवरोधन!इन तीन अंकों के नाटक मंचन से नत्तू को भोजन करा दिया जाता है। किसी जमाने में बब्बन का अदरक के पंजे हिट नाटक था; आजकल तो मोटी-मांऊ की टक्कर का कोई नाटक नही!
पता नहीं, कब तक रहेगा मोटी-मांऊ के आतंक का तिलस्म। कब तक करेंगे नत्तू इसके साये में भोजन!
हाथी राजा बहुत भले
सूंड़ हिलाते कहां चले
कान हिलाते कहां चले
मेरे घर आ जाओ ना
हलुवा-पूड़ी़ खाओ ना!
(मेरी बिटिया की नर्सरी राइम। अब उसके बेटे विवस्वान (नत्तू) पाण्डेय के काम आयेगी।)
सुरेश जोसेफ से मैं मिला नही। जानता भी नहीं। पर गौरी सक्सेना ने मुझे उनके बारे में बताया।
गौरी मेरी सहकर्मी हैं। वे उत्तर-मध्य रेलवे का सामान्य वाणिज्य प्रबन्धन देखती हैं – वैसे ही जैसे मैं मालगाड़ी प्रबन्धन देखता हूं। परसो उन्होने बताया कि सुरेश जोसेफ उनसे मिलने आ रहे हैं। आयेंगे तो वे मुझे फोन कर मिलवायेंगी। पर जोसेफ के आने पर मैं किसी और काम में व्यस्त था, और मुलाकात न हो सकी।
जोसेफ रेल अधिकारी थे, मेरी तरह के। फिर उन्होने रेलवे छोड़ दी। उसके बाद कोच्ची में एक कण्टेनर टर्मिनल का काम देखा। वह प्रोजेक्ट पूरा होने पर इस साल उन्होने अपनी लड़की की शादी की। अब अपने एक मित्र की एक मारुति स्विफ्ट कार उधार ले कर अकेले भ्रमण पर निकले हैं भारत का। बहुत अच्छी तरह नियोजन कर यात्रा प्रारम्भ की है अक्तूबर’१० के प्रारम्भ में।
ओ, मदरासी, तुम उतने ही पागल हो, जितना तीस साल पहले थे! मैं वहीं हूं, जहां तुम शुरू हुये थे। गुडलक!
जोसेफ की यात्रा शुरू करते समय उनके ब्लॉग पर एक टिप्पणी।
सुरेश यह यात्रा विवरण अपने ब्लॉग – The Travels of A Railwayman में लिख रहे हैं। पर्याप्त पठनीय है यह ब्लॉग। अस्सी से अधिक पोस्टें हो चुकी हैं उसमें|
मैं सुरेश जोसेफ और उनकी यात्रा के बारे में क्यों यह पोस्ट लिख रहा हूं, जबकि उनसे बातचीत नहीं है और भविष्य में मिलने की सम्भावना भी कम ही है। केवल और केवल इस लिये कि यायावरी का विचार मुझे फैसीनेट कर रहा है। मेरा स्वास्थ सीक्योर नहीं है और मेरा आर्थिक पक्ष भी पर्याप्त सीक्योर नहीं है। पर दिल की इच्छा है तो है।
सुरेश को अपनी इस यात्रा के स्वप्न को मूर्त रूप देने में एक दशक लग गया। हो सकता है मुझे सपनों को रंग देने और साकार करने में उससे भी कम समय लगे। शायद।
आप उनका ब्लॉग खंगालें!
पिछले चार-पांच महीनों में सोच में कुछ शंकायें जन्म ले रही हैं:
कभी कोई एक चीज सही बताता है, कभी कोई दूसरी। जितना प्रगति हो रही है, उतना वहीं हैं हम। नदी-जंगल-हवा-पानी सब मरे जा रहे हैं हमें जिन्दा रखने की कवायद में।
इण्टेलेक्चुअल जगलरी; माई फुट!
ब्लॉग पर एक सशक्त ट्रेवलॉग - जिसमें सपाटबयानी नहीं संतृप्तबयानी हो, उसका प्रतिमान मिला गिरिजेश राव के कल दिये उनके ब्लॉग के लिंक में:
आठवाँ भाग मैने पढ़ा इण्टरनेट पर। उसके बाद बाकी सात भाग वर्ड डाक्यूमेण्ट में कॉपी किये। उनका प्रिण्टआउट लिया। और फिर इत्मीनान से पढ़ा।
कौन मुगलिया बादशाह (?) था, जिसने कश्मीर के बारे में कहा था:
‘‘गर फिरदौस बर रुए जमीं अस्त।
हमीनस्तो, हमीनस्तो हमीनस्त’’
याद है, सड़क किनारे खड़े हो दक्षिण की तरफ मुँह कर किसी ने शाप दिया था... बोरिंग, जाल, रखवाली..लाख जतन हुए लेकिन कढ़ुवार में मछली पालन नहीं हो पाया तो नहीं हो पाया। शाप फलित हुआ, पिताजी कहते हैं, इस जमाने में वरदान नहीं लेकिन शाप फलित होते हैं, अनेको उदाहरण हैं। ... मेरे देखते देखते समय कितना बदल गया! अब शाप भी नहीं फलते। ...शाप को घटित कहूँ या फलित? ...
पहले देखीं जरूर थीं ये पोस्टें। कम से कम शुरू की कुछ (उसके बाद मैं अस्वस्थ हो गया था)। पर पढ़ी नहीं थीं - लम्बी पोस्टें पढ़ने का धैर्य नहीं दिखाया था।
गिरिजेश की लेखनी का तो वैसे ही कोई जवाब नहीं; और इन पोस्टों में तो अपनी समग्रता ही उँडेल दी है उन्होने। एक मित्र के साथ होली के समय गोरखपुर-पडरौना-रामकोला में शहर-गांव की स्पेस (space - स्थान) में यात्रा के साथ आज से बचपन तक की समय (time - काल) में यात्रा भी है। और जब आप अपने बचपन तक में जाते हैं तो सभी परिवर्तन सपाट भाव से नहीं, पूरी सेण्टीमेण्टालिटी के साथ गूंथ कर अनुभव करते हैं। आपकी लेखनी में अगर वह बयान करने की ताकत है, तो जो कुछ निकलता है, अभूतपूर्व होता है।
गिरिजेश ने वही किया है।
हो सकता है आप मेरी तरह अटेंशन-स्पान संकुचित रहने की समस्या से ग्रस्त न हों; तब तो आपने ये पोस्टें जरूर पढ़ ली होंगी। न पढ़ी हों तो जरूर पढ़ें। इन्हे पढ़ने का बढ़िया तरीका तो यही है कि सब एक जगह डाउनलोड कर इत्मीनान से पढ़ें। वे एक लघु-पुस्तक के रूप में ज्यादा आनन्द देती हैं।
आशा है गिरिजेश इनकी एकीकृत पीडीएफ फाइल अपलोड कर उसका लिंक अपने ब्लॉग पर देंगे। और न दें तो क्या, नामी आलसी हैं वे!
मालुम है, लोग सक्षम हैं ट्रेवलॉग आर्धारित हिन्दी में ब्लॉगों के दसियों लिंक ठेल देने में। पर फिर भी विषयनिष्ठ ब्लॉगों की बात करूंगा तो ट्रेवलॉग आर्धारित ब्लॉग उसमें एक जरूर से तत्व होंगे।
बहुत कम यात्रा करता हूं मैं। फिलहाल डाक्टरी सलाह भी है कि न यात्रा करूं रेल की पटरी के इर्द-गिर्द। संकल्प लेने के बावजूद यहां से तीस किलोमीटर दूर करछना भी न जा पाया हूं। फिर भी साध है यात्रा करने और ट्रेवलॉग लिखने की।
ट्रेवलॉग मुझे वह इण्टेलेक्चुअल संतुष्टि देगा, जो आज तक न मिल सकी। और, शर्तिया, साहित्यकार मर्मज्ञ जी, जो कहते हैं कि मैं निरर्थक लिखता हूं, को भी कुछ काम की चीज मिल सकेगी - उनकी कविता के पासंग में/आस पास!
बहुत से ब्लॉग हैं यायावरी पर। और फोटो/वीडियो ने उनका काम आसान भी कर रखा है। पर काम आसान करने का अर्थ यह है कि पहले से और भी जानदार ट्रेवलॉग सामने आने चाहियें, बेहतर तकनीकी सपोर्ट से। हिन्दी में अन्य भाषाओं से ज्यादा अनूठे और अधिक विलक्षण ट्रेवलॉग सामने आने चाहियें। वेगड़जी की नर्मदा परिक्रमा की तरह!
अब तक जो कुछ अभिव्यक्त करने को मिला, वह अपने काम और अपने अध्ययन से मिला। कुछ मिला सवेरे की सैर के अनुभव (गंगा विषयक पोस्टें उसी से निकली हैं) से। अब वानप्रस्थ आश्रम करीब है। जो कुछ आगे अभिव्यक्त करने को होगा, वह अधिकांशत: घूमने से निकलेगा।
ऑफ्टरॉल नहीं चाहूंगा कि कोई निरर्थक डिक्लेयर करे! या कर सकते हैं? करें। हू केयर्स!
विधाता ने मुझे लेखक नहीं बनाया। यह उनका विधान होगा। पर यह अभिव्यक्ति का माध्यम मुझे दिया है - अधपकी/अनगढ़ अभिव्यक्ति का - ब्लॉगरी। उसमें वह गर्व नहीं है। पर एक अपना आयाम तो है। विधाता मुझे शायद इसी आयाम, इसी जुनून के साथ के साथ जिलाना चाहते हैं।
जाही बिधि राखे राम ताही बिधि रहिये।
फॉर्ब्स इण्डिया; जॉन एफ हैरिस, एडीटर इन चीफ पोलिटिको, के सात चुनिन्दा ब्लॉगर्स की लिस्ट देता है:
हिन्दी ब्लॉगरी की शुरुआत एक छोटे से पर क्लोज-निट ग्रुप(close-knit group) के रूप में हुई थी। और शुरू के दिनों में उस ग्रुप ने बहुत मेहनत की। वही काम अब शायद राजनीतिशास्त्र या दर्शन या किसी अन्य विषय पर हिन्दी में पहल करने वालों को करना होगा। एक क्लोज-निट ग्रुप! ऊर्जावान और सिनर्जेटिक - परस्पर ग्रुप सदस्यों को प्रेरणा देने वाला। तभी विविध विषयों पर सार्थक हिन्दी लेखन पनप सकेगा।
ब्लॉगर बैठकें बहुत हो चुकीं। बहुत गिनी जा चुकी टिप्पणियां। विशेषता-युक्त लेखन वाले कहां हैं? एक दीखते हैं - पुरातत्व पर लिखने वाले श्री पी.एन. सुब्रमणियन। और शायद शरद कोकास (यद्यपि उतना प्वाइण्टेड नहीं)। पुरातत्व पर प्वाइण्टेड लिखने वाले 10-15 और?
इसी तरह के अन्य विषयों पर अन्य गुप?
एक किताब, उपन्यास, वह भी एक नारी का लिखा। पढ़ते समय बहुत से प्रश्न मन में आते हैं - कैसे लिखती हैं उपन्यास वे। कितना वास्तविकता होती है, कितना मिथक। कितनी कोमलता, कितनी सेंसिटिविटी, कितना जबरी की नारीवादिता और कितना अभिजात्य युक्त छद्म। चाहे शिवानी हो, चाहे महाश्वेता देवी। चाहे अरुन्धति रॉय हों। पढ़ते समय इन सब बिन्दुओं पर लेखन को तोलता रहता है मन। और बहुधा अधपढ़ी रह जाती है पुस्तक।
पर यह उपन्यास - कैसा था वह मन - तो लगभग निरंतर पढ़ गया मैं।
एक छोटे शहर की लड़की, एक मध्यवित्त परिवार के लड़के से व्याही जाती है। लड़का बन गया है अफसर। शायद रेल का। और वह अब उस अफसर के साथ जगह जगह रहती है। बड़े बंगले, उनमें अकेला पन और उनमें नर्सरी राइम्स और बाल कथायें बुनती यह महिला। कुछ अलग सी है यह महिला।
सामान्यत: मैने अफसरों की बीवियों को देखा है। क्लब और महिला समिति में अपने आप को प्रोजेक्ट करने की उधेड़बुन में लिप्त। एक दूसरे की बुराई और अपने को सभ्य बताने की होड़ में जिन्दगी गंवाने वाली औरते। तीज त्यौहार में देशज समझ से अनजान एक अजीब सा अफसरापन दिखाती औरतें। बेकार सी औरतें।
उपन्यास अंश:
... (जवा की) नानी ने सुनाया था कि ... वह औरत चुड़ैल थी, जिसके पंजे पीछे थे, एड़ी आगे। गुस्से में उसने पीछे मुड़ कर नानी को फटकारा था - कइसन चाची हौ?
... दीपावली की रात भड़ेहर भाने के बाद (जवा की) बड़ी अम्मा सिर का पल्ला खींच कर कहानी शुरू करतीं - "एक ठे रहलीं अमावस, एक जनी रहलीं पुनवासी। दूनो जनी बहिन रहलीं। अमावस अमीर रहलीं और पुनवासी गरीब!" ...
भीड़ भाड से गुजरते जवा (पेरिस में) के मन में भय एक डर फैल गया था, यदि कहीं सौमित्र का साथ छूट जाये तो जवा का क्या होगा? जवा के पास तो न अपना पासपोर्ट था, न फ्रेंच करेंसी और न फ्रेंच भाषा का ज्ञान ...
लेखिका (निशि श्रीवास्तव) के बारे में:
वे न तो कस्बाई जीवन में पलीं थीं, और न ही अवधी/भोजपुरी उनकी मातृभाषा थी। जो लिखा है वह अपने गहन ऑब्जर्वेशन के आधार पर ही। उनके पास हिन्दी/हिन्दी साहित्य की कोई फॉर्मल सनद नहीं थी। वे जीव-रसायन में स्नातकोत्तर और सूक्ष्म जैविकी में पी.एच.डी./वैज्ञानिक थीं।
वे अब नहीं हैं।
उनका जन्म सन 1953 और निधन सन 2004 में हुआ।
पुस्तक प्रभात पेपरबैक्स (prabhatbooks@gmail.com), 4/19 आसफ अली रोड, नई दिल्ली ने छापी है। मूल्य 95/-
पर यह उपन्यास जिस महिला के चरित्र का प्रकटन करता है, उसकी सरलता और लेखिका की छोटी छोटी बातों को भी पकड़ने-लिखने की क्षमता मुझे बहुत प्रभावित कर गई। कैसा था वह मन? बहुत निर्मल, बहुत अपना सा जी।
और उस मन का इतना विस्तृत वर्णन है कि लगता है यह उपन्यास नहीं, ऑटोबायोग्राफी हो। मुझे बताया गया कि यह ऑटोबायोग्राफी नहीं है। और इस बात से लेखिका - निशि श्रीवास्तव - की लेखन क्षमता और भी सशक्त मालुम पड़ती है।
बहुत कम लिखा देखा है इतनी सरलता और इतने विस्तार से पूर्वांचल के छोटे शहर/कस्बाई औरतों की चर्या और एक सरल सी महिला का एक काम में लगे रहने वाले अफसर के साथ जीवन यापन का वर्णन।
मन का वर्णन।
और अंत में मन चल पड़ता है अनचीन्ही पगडण्डी पर - टेलीफोन की घण्टी, डाक्टर, एम्ब्यूलेंस!
कैसा था वह मन - आप पढ़ कर देखें!
साहित्य और पुस्तकों की दुनियां में जबरदस्त लॉबीइंग है। भयंकर गुटवाद। प्रतिष्ठित होने में केवल आपका अच्छा लेखन भर पर्याप्त नहीं है। वह होता तो यह पुस्तक शायद बेहतर जानी जाती। यह तो मेरा अपना, किनारे खड़े व्यक्ति का, देखना है।
डैम! लीक्स और टेप्स के जमाने में इंस्टेण्ट कमेण्ट्स और इंस्टेण्ट विशेषज्ञता का विस्तार हो रहा है। एनडीटीवी का दस बजे का कार्यक्रम देख #बरखागेट पर ट्विटर कमेण्ट्स की भरमार हो गयी है। वाल स्ट्रीट जर्नल का इण्डिया रीयलटाइम का ब्लॉग-छत्ता फटाफट पोस्ट/कमेण्ट/पोल्स दिये जा रहा है।
मैं इस फिनॉमिना ( नेट पर जन आवाज) से चमत्कृत हूं और इसे समझने का यत्न कर रहा हूं। पर इससे तड़ से निष्कर्ष निकालने की दशा में नहीं हूं।
विनीतकुमार तो मनीकण्ट्रोल पर दिये गये कमेण्ट्स और एनडीटीवी की स्टॉक वैल्यू के जरीये विशेषज्ञ पोस्ट ठेल दे रहे हैं – पिट रहा है एनडीटीवी का शेयर, बरखादत्त का जल्द ही होगा पत्ता साफ । वाह, शेयर सब के पिटे हैं। (हमारा मुरैना से सोया की खली और तेल लदान करने वाले तेल शोधक का शेयर भी लगभग उतना ही पिटा है जितना एनडीटीवी का!१) पर अगर आप मीडिया स्पेशलिस्ट हैं तो चिन्दियां बटोर कर भी बुद्धिमत्ता पूर्ण पोस्ट टिका सकते हैं और हिन्दी ब्लॉग के हम भकुआ पढ़वैय्ये कहते हैं - विचारणीय ...चिंतनीय/बहुत अच्छी खबर दी!
इस पोस्ट पर सही टिप्पणी नीरज रोहिल्ला की है, और उसी ने मुझे यह पोस्ट लिखने का ध्येय दिया:
वाह,
गेस्ट पोस्ट और फ़ोरम्स से बढिया निष्कर्ष निकाले हैं। अगली बार रेडिफ़ और टाईम्स आफ़ इंडिया के कमेन्ट्स से भारत की विदेश नीति भी निर्धारित हो सकती है।
बधाई
हमें लगता है कि हम भी एक ठो बुद्धिमता का कोट सिलवाय कर गुरु-गम्भीर तरीके से हुंकारात्मक ठेला करें। रोज ट्विटर की ट्वीट्स बटोर कर।
हिन्दी ब्लॉगरी में विशेषज्ञता की जय हो!