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Wednesday, 16 November 2011

माया की बंटवारे की गणित

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री मायावती ने जो सियासी कार्ड खेला है, फिलहाल उसपर अमल हो ना हो मगर राजनीतिक गलियारे में सरगर्मी तेज हो गई है। राज्य स्तरीय दलों सहित केंद्र में राज कर रही कांग्रेस और मुख्य विपक्षी दल भाजपा भी मजबूरी में माया के इस प्रस्ताव के समर्थन में खड़े नजर आ रहे हैं। समाजवादी पार्टी ने मायावती के राज्य के बंटवारे का विरोध करना तय किया है। मुलायम सिंह ने कहा है कि वे किसी भी हालत में राज्य का बंटवारा नहीं होने देंगे। मायावती ने यूपी को बांट कर चार राज्यों पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश बनाने की वकालत की है।
मायावती के इस एलान के समय प्रस्तावित राज्यों में विभिन्न राजनीतिक दलों का राजनीतिक समीकरण कुछ ऐसा है-
१- पूर्वांचल ( कुल सीटें-187)। इनमें बसपा (102), कांग्रेस(12),भाजपा (20), सपा (47),अन्य (06)।
२- अवध प्रदेश ( कुल सीटें हैं-79)। इनमें बसपा (43), कांग्रेस (03), भाजपा ( 09), सपा (23), अन्य (01)।
३- बुंदेलखंड ( कुल सीटें हैं-21)। बसपा (15) ,कांग्रेस ( 02), भाजपा (00), सपा( 04), अन्य (00)।
४- पश्चिम प्रदेश ( कुल सीटें हैं-116)। बसपा (61), कांग्रेस ( 03), भाजपा (19), सपा (14), अन्य (19)।


अब अगर यूपी को विभाजित कर बनने वाले चार नये राज्यों के राजनीतिक समीकरण पर चर्चा करें तो जो भी नये राज्य होंगे उनमें बसपा की सीटें अन्य पार्टियों से कहीं ज्यादा हैं। अलग होने के बाद उन चार राज्यों में चुनाव होने पर बसपा बढ़त में रहेगी। यानी चारों नये राज्यों की सत्ता पर बसपा काबिज हो सकती है। ऐसे में एक और संभावना है कि माया इन राज्यों में अपने नुमाइंदों को बैठाकर खुद 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिये सीढ़ी तैयार कर रही हों।

आखिर क्या वजह है कि माया के एक वार से ही सभी राजनीतिक दल बैकफुट पर आ गये। दरअसल यह प्रस्ताव माया का नहीं बल्कि जनता की मांग है। मायावती इस प्रस्ताव को साढ़े चार सालों से रोक कर चुनाव से ठीक पहले पेश करने की जुगत में थी। तमाम स्थानीय दल जैसे कि अजीत सिंह की रालोद और कल्याण की जनक्रांति सहित तमाम पार्टियां बंटवारे के इस प्रस्ताव पर ही राजनीति कर रही थी। अब ये पार्टियां माया के इस प्रस्ताव का विरोध करने के बजाये सीधे उनका दामन थाम लिया है।

यूपी में सत्ता में वापसी की छटपटाहट में बड़े राजनीतिक दल कांग्रेस और भाजपा जनता की भावनाओं को भांपते हुए माया के समर्थन में आ खड़े हुए हैं। माया के इस प्रस्ताव का समर्थन करना भाजपा की मजबूरी बन गई है। भाजपा ने इससे पहले यूपी से तोड़कर उत्तराचंल को अलग किया था, जो बाद में उत्तराखंड बना। बीजेपी ने उस समय भी राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से ही यूपी से निकाल नया राज्य बनाया था जहां आज भी वहीं काबिज है। दूसरी तरफ कांग्रेस तेलंगाना को भले ही अलग राज्य बनाने की मंजूरी ना दे रही हो, लेकिन यूपी में वह माया से सहमत नजर आ रही है।

कांग्रेस को भी पता है कि वह इतने बड़े राज्य में वापसी नहीं कर पायेगी, जिसका इंतजार उसे पिछले 22 साल से है। चाह कर भी कांग्रेस माया के दलित वोट बैंक पर डाका नहीं डाल पाई है। अब बंटवारे के बाद भौगोलिक स्तर पर हुए बदलाव का फायदा मिलने की उम्मीद कांग्रेस भी इस प्रस्ताव से लगाए बैठी होगी। इतना ही नहीं कांग्रेस हमेशा से कहती रही है कि अगर राज्य सरकार से यूपी को बांटने का प्रस्ताव आता है तो वह उसका समर्थन करेगी। अब चुनावों से ठीक पहले वह अपने वायदे से मुकर जनता का विरोध नहीं झेलना चाहती।

चुनावी स्टंट
समाजवादी पार्टी (सपा) ने इस प्रस्ताव का विरोध करने का एलान किया है तो कांग्रेस ने राज्य के प्रस्तावित विभाजन को एक संवेदनशील मुद्दा बताया और कहा कि इस पर निर्णय केवल विस्तृत चर्चा के बाद ही लिया जा सकता है.समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने कहा कि उनकी पार्टी राज्य के विभाजन का विरोध करेगी.उन्होंने कहा कि मायावती चुनावों में हार की डर से इस तरह की घोषणाएं कर रही हैं.
मुलायम ने कहा कि मायावती भ्रष्टाचार एवं अपनी असफलताओं से लोगों का ध्यान भटकाने का प्रयास कर रही हैं. मुलायम सिंह यादव ने कहा कि राज्य की मुख्यमंत्री मायावती का यह कदम जनता को बेवकूफ बनाने वाला चुनावी स्टंट और राजनीतिक साजिश है.
सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह यादव ने कुशीनगर में कहा कि राज्य के विभाजन से विकास सम्बंधी किसी भी उद्देश्य का समाधान नहीं होगा.

कांग्रेस के वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि मायावती ने जो कुछ भी किया है वह केवल राजनीतिक है और उनका केवल एक ही एजेंडा है और यह उत्तरप्रदेश का 2012 का विधानसभा चुनाव है.द्वितीय राज्य पुनर्गठन आयोग की पुरजोर वकालत करते हुए सिंह ने कहा कि राज्यों का बंटवारा काफी जटिल मुद्दा है. कांग्रेस मीडिया विभाग के अध्यक्ष जनार्दन द्विवेदी ने नई दिल्ली में कहा कि पार्टी सिर्फ चुनावी लाभ को देखकर लिए गए निर्णय को स्वीकार नहीं करेगी.

केंद्रीय पेट्रोलियम राज्य मंत्री आरपीएन सिंह ने भी विभाजन को चुनावी हथकंडा बताया और कहा कि राज्य को विभाजित करने जैसा बड़ा निर्णय कोई एक राजनीतिक दल नहीं कर सकता. इसके लिए राजनीतिक सहमति एवं संसद की अनुमति चाहिए.

भाजपा प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने कहा कि अपनी सरकार के साढ़े चार वर्ष बीतने के बाद मायावती को राज्य को विभाजित करने की बात याद कैसे आ गई? मायावती पर आरोप लगाते हुए हुसैन ने कहा कि चुनाव आ गए हैं और साढ़े चार वर्ष बीतने के बाद मायावती को अगड़ी जातियों की याद आ गई. उन्हें राज्य के विभाजन की भी बात याद आ गई भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कहा कि यह घोषणा सिर्फ 'चुनाव के समय लोगों को मूर्ख बनाने' के लिए है. भाजपा नेता उमा भारती ने कहा कि मायावती ने घोषण चुनाव से ठीक पहले की है और इसमें स्थानीय लोगों की भावनाओं को ध्यान में नहीं रखा है.
सपा के पूर्व नेता एवं राष्ट्रीय लोक मंच के प्रमुख अमर सिंह ने कहा कि वह समझ नहीं पा रहे हैं कि सपा विभाजन का विरोध क्यों कर रही है.
साभार- http://hindi.oneindia.in/news/2011/11/16/mayawati-making-ladder-centre-dividing-uttar-pradesh-aid0129.html
http://www.samaylive.com/nation-news-in-hindi/133693/uttar-pradesh-division-mayawati-government-proposal-state-politi.html

1 comments:

जाट देवता (संदीप पवाँर) said...

बेहतरीन प्रस्तुति। सही कहा है
शानदार अभिव्यक्ति,

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