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गजल मने प्रेम, प्रेम मने जीवन, जीवन मने अहाँ।

27.5.12

गजल आई फेर पुछैय लोक हमरा अहाँ किएक उदास छि
आ हम पूछलएन हुनका सं अहाँ किएक नीरास छि

जातपातक भेदभाव कोना उत्तपन भेल मधेश में
ताहि चिंतन में हम डुबल छि अहाँ किएक नीरास छि

थरुहट अबध मिथिला भोजपुरा नै चाही मधेश के
मधेशी के चाही स्वतंत्र मधेश अहाँ किएक नीरास छि

अखंड मधेश केर विखंडन में शाषक अछि लागल
हेतै क्रूरशाषक के अवसान अहाँ किएक नीरास छि

सहिदक सपना मधेश एक प्रदेश बनबे करतै
निरंकुश शाषक मुईल जेतै अहाँ किएक नीरास छि
............वर्ण-२१..............
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

26.5.12

गजल

ओ निसाँ शराब में कतए चाहि जे पिबैक लेल
बहाँना माहुर में कतए चाहि जे चिखैक लेल
सगरो बहल अछि धाड आब शराबक देखू
लाबू कतय सँ सूई-ताग ई धाड सिबैक लेल
बचल किए आब शराबे टूटल करेज लेल
बहुतो छै जीबन में एकर बादो जिबैक लेल
जँ डगमगएल डेग शराबे किएक थामलौं
बाँकी अछि एकर बादो बहुत सिखैक लेल
बहाँना बहुत अछि दुनियाँ में एखनो जिबै के
आबू मनु देखू बहुत किछ अछि पिबैक लेल
वर्ण- १८
जगदानन्द झा 'मनु'

रुबाइ

पीलौं शराब तँ दुनिआ कहलक बताह
नहि पिने ई दुनिआ लगैत अछि कटाह
बिन पिने सभतरि मचल अछि हाहाकार
तँ पिबिए क' किएक नहि बनि जाइ घताह

रुबाइ



बहुत पी लेलहु आब और जिद नै करू
बहुत जी लेलहु आब और जिद नै करू
टूटि रहल करेज हमर किश्त किश्त मे
बहुत सी लेलहु आब और जिद नै करू

रुबाइ




कनियें लगा लिअ मुँह बोतलकेँ सप्पत
फेनसँ सजा लिअ मुँह बोतलकेँ सप्पत
सुख तँ गुलाम छै निसाँ केर दुनियाँमे
सभ दुखकेँ भसा लिअ बोतलकेँ सप्पत

गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-17


अरविन्द ठाकुर

प्रकाशित गजल संग्रह---बहुरुपिया प्रदेश मे। ( नवारम्भ प्रकाशन, साल नवम्बर-2011)


अन्य प्रकाशित कृति---- परती टूटि रहल अछि ( कविता), अन्हारक विरोधमे ( कथा)
जन्म---14 February 1957, सुपौल

25.5.12

गजलकार परिचय श्रृखंला भाग-16



राजेन्द्र विमल, जनकपुर, नेपाल


प्रकाशित गजल संग्रह----सूर्यास्तसँ पहिने


मैथिली, नेपाली आ हिन्दी भाषाक प्राज्ञ विमल शिक्षाक हकमे विद्यावारिधि (पी.एच.डी.)क उपाधि प्राप्त कएने छथि।कम्मो लिखिकऽ यथेष्ट यश अरजनिहार डा. विमलक लेखनीक प्रशंसा मैथिलीक सङ्गसङ्ग नेपाली आ हिन्दी साहित्यमे सेहो होइत रहलनि अछि। त्रिभुवन विश्वविद्यालयअन्तर्गत रा.रा.. कैम्पस, जनकपुरधाममे प्राध्यापन कएनिहार डा. विमलक पूर्ण नाम राजेन्द्र लाभ छियनि। हिनक जन्म २६ जुलाई १९४९ ई. कऽ भेल अछि। साहित्यकारक नव पीढ़ीकेँ निरन्तर उत्प्रेरित करबाक कारणे ई डा.धीरेन्द्रक बाद जनकपुर-परिसरक साहित्यिक गुरुक रूपमे स्थापित भऽ गेल छथि।



24.5.12

बन्द

एकटा बन्द प्रस्तुत कए रहल रहल छी....कने देखबै....

गजलसँ सजल अछि विदेह
शेरसँ भरल अछि विदेह
प्रेमसँ जड़ल अछि विदेह
मोनसँ जुड़ल अछि विदेह
सभठाँ घुसल अछि विदेह
आब तँ अचल अछि विदेह

गजल

प्रस्तुत अछि स्वाती लाल जीक ई गजल



मिथिला राज के माँग जे उठलै नकाब ओकरा उतारैत देखलौ
कहै छलै हमर धर्म छै मिथिला नया धर्म अपनाबैत देखलौ

समाज केना सहि रहल छै तालिबानी पाएर पसारैत देखलौं
निर्दोष सब के खून स ओकरा अपन पियास बुझाबैत देखलौं

तरह तरह के मदारी सब के डम डम डमरु बजाबैत देखलौं
ककरो अखण्ड ककरो खण्ड खण्ड स्वतँत्र टुकडा माँगैत देखलौं

अपन स्वार्थ के खातीर किछु के नीत नव सपना बाँटैत देखलौं
हमरो चाही हमरो चाही किछु के सपना माँगैत देखलौं

“रा-वन” सब के फेसबुक पर राम कथा हम बाचैत देखलौं
राजनिती के केसिनो मे मानवता के हारैत देखलौं

आन'क घर के "भगत" शहीद होय देश राग हम गाबैत देखलौं
शहीद सब के लास पर चढि क’ ओकरा कुर्सी पाबैत देखलौं

फुटलै चुडी माँग उजडलै करेज हम हूनकर फाटैत देखलौं
राम ने औता घुरि क’ तैयो आस मे सीया के काँनैत देखलौं

एक तरफ फेरो भीड छै लागल ओहने मँच सजाबैत देखलौं
कहिं कोनो बच्चा ने होइ फेरो टुग्गर मने मन डराइत रहलौं ll

(आई जे हम लिखने छी से फेसबुक पर पब्लिकली पोष्ट भेल ई चित्र सब देखला के बाद, एकटा मे शहीद दीपेन्द्र दास के पत्नी अपन छोटका बेटा के साथे दोसर मे शहीद दीपेन्द्र दास'क जेठका बच्चा जे बेटा होबै के अन्तिम कर्तब्य पुरा करै के लेल इहे उमर मे बाध्य भ गेल , … लोक शहीद भ'जाइत छैथ, छोडि जाइत छैथ अपन लोक के लेल शब्द मे ब्यक्त नै होबै बाला मानबिय बेदना...सब शहीद के श्रधाँजली के साथे परिबार प्रति समबेदना सहित हमर आइ के ई पोष्ट समर्पित l )

गजल

प्रस्तुत अछि स्वाती लाल जीक ई गजल---




बहन्ना ओकर कत्तेक सुनिऐ बड निष्ठुर मन मीत हमर अछि
बदलैत मौसम डर लगैया बड ब्याकुल सन प्रीत हमर अछि

कहब सुनब कीछ ने बाँकी राखब हृदय के भितर आब त हम
जीबन पथ पर साथ चलब हम ओकरे संग हीत हमर अछि

बितल मास बसन्ती राग बसन्ती पतंग बनी उडि पहुँचितौं हम
लोक लाज सॉ पाएर उठल नै केहन समाज'क रीत हमर अछि

पूर्ण चन्द्र छै मुदा लगैत अमाबस अन्हार बड राति बितत कोना
प्रकाशपुँज बनी आयल जौं बुझब तखन हम जीत हमर अछि

चान'क इजोरिया सॉ मन'क अन्हरिया दुर कोना क भगबिएै हम
फेर उठल दरद मन मे बिरह भरल बस गीत हमर अछि


(बर्ण- २६)

गजल


गजल-४९

फूल नै बनलौँतऽ की,काँट बनिगड़ैत तऽ छी

प्रेम नैकेलौँ तऽ की,संग हमर लडैत तऽ छी


अन्हार छै घरतऽ की, दीप बनि जड़ैततऽ छी

सोँझा नैहँसलौँ तऽ की,परोछ मे कनैततऽ छी


अपना नै सकलौँतऽ की, संगमे रहैत तऽछी

भऽनै जाइ आनकसंगी,से सोचि मरैततऽ छी


सुख नै देलौँतऽ की, संगे दुख कटैततऽ छी

मीत नै भेलौतऽ की, रूसल मेबौँसैत तऽ छी


बुझि कऽबकलेले हमरा,अहाँ हँसैत तऽ छी

छी अकछायल तऽकी, बात तैयोसुनैत तऽ छी

---------वर्ण-१७---------------

रुबाइ


रुबाइ-13

अहीँक प्रेमक छाह जीब' चाहै छी

अहीँक आँचरक हवा पीब' चाहै छी

अपन फाटल करेजा सीब' चाहै छी

अहीँक नैनक शराब पीब' चाहै छी

रुबाइ


रुबाइ-14


करेजक तह मे चौपैत रखलौँ जकरा

खून अपन पिया पोसैत रहलौँ जकरा

जुआनीक मद बौरायल सैह लगैछ

परल एकात समाज मे बनलौँ फकरा |

रुबाइ


रुबाइ-11

ताड़ी छानब छोड़ि छानू निज विचार

दारू ताकब त्यागि ताकू संस्कार

अप्पन घर जाड़ि भट्ठी मे छी बैसल

नजरि उठा देखू जड़ल केहन कपार ।

रुबाइ

रुबाइ-12

सत्ते अहाँ कखनो मोन नहि पड़ैत छी,

किएकतऽ सदिखन मोने मे रहैत छी

फूल बनि सदिखन हृदय मे गमकैत छी

अहीँक नेहक जोत सँ हम चमकैत छी ।

रुबाइ


रुबाइ-9

देखू पियक्कर बताह जमाना के

सून्न मंदिर भरले ताड़ीखाना के

कनैत लोक हँसी किनबा ले लुटबैछ

पेट काटि जोगाओल खजाना के ।

रुबाइ


रुबाइ-10

दूध सँ बेशी स्वाद लगैए ताड़ी मे

खेत बिकैल लागल हाथ घराड़ी मे

एखन तऽ अमृत लगैए चिखना संगे

बुझबै जखन लीवर सड़त बुढ़ारी मे

हजल


हजल

गुरूजी बैसलाह खोलि खटाल

चेलवा बनलनि गुरू घंटाल ।


घूर जरौलन्हि पोथी केर टाल

दूध बेचि कऽ देखू भेला नेहाल ।


ईसकुल जाऽकऽ भेलाह कंगाल

माल पोसिकऽ भेलाह मालामाल।


पशुगणना कऽ फुटलनि भाल

पशुपालन सँ रुपैयाक टाल ।


घी-दूध पीबि भेलनि देह लाल

आब अखाड़ा बिच ठोकथि ताल ।


गुरुआनिक गजबे रंगताल

ठोरक संग-संग रांगथि गाल ।


गुरुजी बैसलाह खोलि खटाल

ज्ञानक पूँजीओ गेलनि पताल ।-------वर्ण-१२-----------

गजल


गजल-४८

दू लबनी केरखेला देखू

लागल रेलमरेला देखू


फुसिए ठेलमठेला देखू

बलजोड़िकझमेला देखू


मत्त गुरू संगचेला देखू

नाच करैअलबेला देखू


जीवन केसंध्यावेला देखू

कानै अनाथकोरेला देखू


विषले लागलमेला देखू

अमृत भेलकरेला देखू/------वर्ण-१०------

गजल


गजल-४७

राति सपन मेप्रियतम एलाह

कर-कौशल सँहमरा जगेलाह


काँच निन्नटूटल,मोन कछमछ

उड़ीबिड़ी लगाअपने नुकेलाह


देहक पानि बनिबहल पसेना

अधरतिये मोनप्यास लगेलाह


कसमस आञ्गि नखलागि फाटल

चेन्ह सगर देहनह गरेलाह


हमरा संग कतखेल खेलेलाह

"चंदन"तखन जा मोन जुड़ेलाह

----वर्ण-१३-------