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Posted by: PRIYANKAR | मार्च 29, 2011

कवि सब अच्छे हैं ….

भवानीप्रसाद मिश्र की एक कविता 

 

लोग सब अच्छे हैं

कवि सब अच्छे हैं

चीज़ें सब अच्छी हैं

तुलनाएं मत करो

समझो अलग-अलग सबको

समझो अलग-अलग देखो –

स्नेह से और सहानुभूति से

एक हैं सब और अच्छे

चीज़ों की तुलना का

क्या अर्थ है

सब चीज़ें अपने-अपने ढंग से

पूरी हैं

और सब लोग

अधूरे हैं

कवि की अलग बात है

वह न चीज़ों में आता है

न लोगों में ठीक-ठीक

समाता है उस समय

जब वह लिखता होता है

जो संयोगों के अर्थों

और अभिप्रायों में पड़ा है

वह किससे छोटा है

किससे बड़ा है

एक ठीक कवि की

किसी दूसरे ठीक कवि से

तुलना मत करो

पढ़ कर उन्हें अपने को

अभी खाली करो

अभी भरो !

****

* भवानी भाई,सिवनी-मालवा में लोक सम्मान(१९७३)



विनय मजूमदार (1934-2006)

(बांग्ला से अनुवाद एवं प्रस्तुति : नीलकमल)



अकाल्पनिक

तुम्हारे भीतर आऊंगा, हे नगरी, कभी-कभी चुपचाप
बसन्त में कभी, कभी बरसात में
जब दबे हुए ईर्ष्या-द्वेष
पराजित होंगे इस क़लम के आगे
तब, जैसा कि तुमने चाहा था, एक सोने का हार भी लाऊंगा उपहार।
तुम्हारा सर्वांग ज्यों इश्तहार
यौवन के बाज़ार का, फिर भी तुम्हारे पास आकर
महसूस होता है, जैसे तुम्हारी अपनी
एक तहज़ीब है, सिर्फ़ तुम्हारी, और जो आदमी के भीतर की
चिरन्तन वृत्ति का प्रकाश भी है।
हे नगरी, महज कुछ-एक बार तुम्हारे भीतर आना
यह एहसास देता है कि जैसे तीनों-लोक में
नहीं कोई भी तुम्हारे जैसा, तुम्हारा नशा, तुम्हारी देह, तुम्हारी बातें, और तुम्हारा स्वाद है ऐसा।

****

राजेन्द्र राजन की एक कविता

तुम अकेले नहीं हो विनायक सेन

 

जब तुम एक बच्चे को दवा पिला रहे थे
तब वे गुलछर्रे उड़ा रहे थे
जब तुम मरीज की नब्ज टटोल रहे थे
वे तिजोरियां खोल रहे थे
जब तुम गरीब आदमी को ढांढस बंधा रहे थे
वे गरीबों को उजाड़ने की
नई योजनाएं बना रहे थे
जब तुम जुल्म के खिलाफ आवाज उठा रहे थे
वे संविधान में सेंध लगा रहे थे

 
वे देशभक्त हैं
क्योंकि वे व्यवस्था के हथियारों से लैस हैं
और तुम देशद्रोही करार दिए गए

जिन्होंने उन्नीस सौ चौरासी किया
और जिन्होंने उसे गुजरात में दोहराया
जिन्होंने भोपाल गैस कांड किया
और जो लाखों टन अनाज
गोदामों में सड़ाते रहे
उनका कुछ नहीं बिगड़ा
और तुम गुनहगार ठहरा दिए गए

लेकिन उदास मत हो
तुम अकेले नहीं हो विनायक सेन
तुम हो हमारे आंग सान सू की
हमारे लिउ श्याओबो
तुम्हारी जय हो ।

****

Posted by: PRIYANKAR | अक्टूबर 5, 2010

केदारनाथ अग्रवाल की एक कविता

केदारनाथ अग्रवाल (1911 — 2000)

अहिंसा

मारा गया
लूमर लठैत
पुलिस की गोली से

किया था उसने कतल
उसे मिली मौत
किया था कतल पुलिस ने
उसे मिला ईनाम

प्रवचन अहिंसा का
हो गया नाकाम !

(२१-६-१९७२)

****
(कवि के संकलन ’कहें केदार खरी-खरी’ से साभार)

Posted by: PRIYANKAR | सितम्बर 19, 2010

नीलकमल की एक कविता

सहज-सुदर्शन युवा कवि नीलकमल का पहला कविता-संग्रह ’हाथ सुंदर लगते हैं’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है . उन्हें बहुत-बहुत बधाई !  यानी ’एक हथौड़ेवाला घर में और हुआ’ . शुभकामनाओं के साथ प्रस्तुत है इसी संग्रह से उनकी एक कविता :

पोखरण-2

 

बुद्ध चौबीस वर्षों के बाद

फिर हंसे

पांच ठहाकों ने फेर दीं

दुनिया की नज़रें

सारनाथ की वह सभा

पीढ़ियों बाद अपने उपदेशक से

जानना चाहती है

बोधिवृक्ष की जड़ें कहां हैं ?

****

Posted by: PRIYANKAR | जुलाई 22, 2010

आलोक धन्वा की एक कविता

नदियाँ

इछामती और मेघना
महानन्दा
रावी और झेलम
गंगा गोदावरी
नर्मदा और घाघरा
नाम लेते हुए भी तकलीफ़ होती है

उनसे उतनी ही मुलाक़ात होती है
जितनी वे रास्ते में आ जाती हैं

और उस समय भी दिमाग़
कितना कम पास जा पाता है
दिमाग़ तो भरा रहता है
लुटेरों के बाज़ार के शोर से।

*****

युवा कवि विमलेश त्रिपाठी की दो कविताएं :

अर्थ विस्तार

जब हम प्यार कर रहे होते हैं
तो ऐसा नहीं
कि दुनिया बदल जाती है

बस यही
कि हमें जन्म देने वाली मां के
चेहरे की हंसी बदल जाती है

हमारे जन्म से ही
पिता के मन में दुबका रहा
सपना बदल जाता है

और
घर में सुबह-शाम
गूंजने वाले
मंत्रों के अर्थ बदल जाते हैं।

*****

वैसे ही आऊंगा

मंदिर की घंटियों की आवाज के साथ
रात के चौथे पहर
जैसे पंछियों की नींद को चेतना आती है

किसी समय के बवंडर में
खो गए
किसी बिसरे साथी के
जैसे दो अदृश्य हाथ
उठ आते हैं हार  के क्षणों में

हर रात सपने में
मृत्यु का एक मिथक जब टूटता है
और पत्नी के झुराए होंठो से छनकर
हर सुबह
जीवन में जीवन-रस आता है पुनः जैसे

कई उदास दिनों के
फाके क्षणों के बाद
बासन की खड़खड़ाहट के साथ
जैसे अंतड़ी की घाटियों में
अन्न की सोंधी भाप आती है

जैसे लंबे इंतजार के बाद
सुरक्षित घर पहुँचा देने का
मधुर संगीत लिए
प्लेटफॉर्म पर पैसेंजर आती है

वैसे ही आऊँगा मैं…..

*****

एक कविता : १९ फरवरी २०१०

चुभा कर कृतघ्नता की कटार मेरे वक्ष में
वे सब चले गए हैं अपने-अपने कक्ष में

मैं उनकी अनुकम्पाओं का अहसानमंद हूं
चुपचाप घावों को सहलाता कोठरी में बन्द हूं

उन्हें जो कुछ लेना था मुझसे, ले गए
उन्हें जो कुछ देना था मुझको, दे गए ।

****
Here is its English rendering:

I am almost done to death by their ingratitude
Nursing the wounds without a word, in solitude

I am grateful to what they have done
Though saddened yet complaints none

They have taken from me whatever they could
They have given me only that which they would

****
(English Translation by the poet himself)

समझदारों का गीत

हवा का रुख कैसा है, हम समझते हैं
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं
हम समझते हैं ख़ून का मतलब
पैसे की कीमत हम समझते हैं
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है, हम समझते हैं
हम इतना समझते हैं
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं.

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं
बोलने की आजादी का
मतलब समझते हैं
टुटपुंजिया नौकरी के लिए
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं
मगर हम क्या कर सकते हैं
अगर बेरोज़गारी अन्याय से
तेज़ दर से बढ़ रही है
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के
ख़तरे समझते हैं
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं
हम समझते हैं
हम क्यों बच जाते हैं, यह भी हम समझते हैं.

हम ईश्वर से दुखी रहते हैं अगर वह सिर्फ़ कल्पना नहीं है
हम सरकार से दुखी रहते हैं कि वह समझती क्यों नहीं
हम जनता से दुखी रहते हैं क्योंकि वह भेड़ियाधसान होती है.

हम सारी दुनिया के दुख से दुखी रहते हैं
हम समझते हैं
मगर हम कितना दुखी रहते हैं यह भी
हम समझते हैं
यहां विरोध ही बाजिब क़दम है
हम समझते हैं
हम क़दम-क़दम पर समझौते करते हैं
हम समझते हैं
हम समझौते के लिए तर्क गढ़ते हैं
हर तर्क गोल-मटोल भाषा में
पेश करते हैं, हम समझते हैं
हम इस गोल-मटोल भाषा का तर्क भी
समझते हैं.

वैसे हम अपने को
किसी से कम नहीं समझते हैं
हर स्याह को सफेद
और सफ़ेद को स्याह कर सकते हैं
हम चाय की प्यालियों में तूफ़ान खड़ा कर सकते हैं
करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते
यह भी हम समझते हैं.

****

गोरख पाण्डेय की इस कविता का अमिताभ बच्चन द्वारा किया गया अंग्रेज़ी अनुवाद देखें :

THE SONG OF THE SENSIBLE

by Gorakh Pandey ( English translation by Amitabh Bachchan )

 What way the winds blow, I can understand

Why we show our backs to it, I can understand

I understand the meaning of blood

The value of money I understand

What is for and what is against, I can understand

I even understand this

We are scared to be able to understand, and remain silent.

I can understand the meaning of remaining quiet

When we speak we speak with thinking and understanding

The freedom to speak

Its meaning, I can understand

For a pathetic and measly employment

To sell our freedom, the meaning of that I can understand

But what can we do

When unemployment

Rises faster than the injustice

The dangers of freedom and unemployment, I understand

We narrowly escape the dangers of terror

I can understand

Why we escape and get saved, this too I can understand.

We remain disappointed and are pained by the Almighty if he does not just remain an imagination

We remain disappointed and are pained by the Government why it does not understand

We remain disappointed and pained by the common man because it succumbs to a herd mentality.

We remain pained by the pain of the entire world

I can understand

But how much we remain pained by this pain this too

I can understand

That opposition is the desired step to take

I can understand

At every step we make compromising understandings

I can understand

We make deep commitments for this understanding

Every deep commitment we present in ambiguous language

I can understand

The reason for this ambiguous language also

I understand.

Incidently, we do not consider ourselves

Less than anyone, I can understand

Every black to white

And white to black we are capable of converting

We are capable of creating a storm in a tea cup

If we want we can start a revolution also

If the Government is weak and the common man understanding

But I can understand

That there is nothing that we can do

Why there is nothing that we can do

This too I can understand.

****

translation courtesy :  http://blogs.siliconindia.com/Amitabhbachchan

Posted by: PRIYANKAR | फ़रवरी 14, 2010

दो प्रेम कविताएं

केदारनाथ अग्रवाल की एक कविता

जमुन जल तुम

रेत मैं हूं — जमुन जल तुम !
मुझे तुमने
हृदय तल से ढंक लिया है
और अपना कर लिया है
अब मुझे क्या रात — क्या दिन
क्या प्रलय — क्या पुनर्जीवन !

रेत मैं हूं — जमुन जल तुम !
मुझे तुमने
सरस रस से कर दिया है
छाप दुख-दव हर लिया है
अब मुझे क्या शोक — क्या दुख
मिल रहा है सुख — महासुख !

****

आलोक श्रीवास्तव की एक कविता

एक दिन आयेगा

एक दिन आयेगा
जब तुम जिस भी रास्ते से गुज़रोगी
वहीं सबसे पहले खिलेंगे फूल

तुम जिन झरनों को छुओगी
सबसे मीठा होगा उनका पानी
जिन दरवाजों पर
तुम्हारे हाथों की थपथपाहट होगी
खुशियां वहीं आयेंगी सबसे पहले

जिस भी शख्स से तुम करोगी बातें
वह नफ़रत नहीं कर पाएगा
फिर किसी से

जिस किसी का कंधा तुम छुओगी
हर किसी का दुख उठा लेने की
कूवत आ जायेगी उस कंधे में
जिन भी आंखों में तुम झांकोगी
उन आंखों का देखा हर कुछ
वसंत का मौसम होगा

जिस भी व्यक्ति को तुम प्यार करोगी
चाहोगी जिस किसी को दिल की गहराइयों से
सारे देवदूत शर्मसार होंगे उसके आगे

चैत्र के ठीक पहले
पत्रहीन हो गये पलाश-वृक्षों पर
जैसे रंग उतरता है
ऋतु भीगती है भोर की ओस में
वैसे ही गुजरोगी तुम एक दिन
हमारी इच्छाओं दुखों और स्वप्नों के बीच से

एक दिन आयेगा
जब हम दुखी नहीं होंगे तुम्हें ले कर
तुम्हें दोष नहीं देंगे
उम्मीदें नहीं पालेंगे
पर, सचमुच तुम्हें चाह सकेंगे
तुम भी महसूस कर सकोगी
हमारे प्यार का ताप ।

*****

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